Bokaro: जिले से एक ऐसी संवेदनशील और दिल को झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जिसने पारिवारिक रिश्तों, सामाजिक मर्यादाओं और बदलती पीढ़ी की सोच पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है. एक बेबस और स्वाभिमानी मां ने अपनी ही जीवित बेटी का बिहार के मोक्षधाम गया में जाकर पिंडदान कर दिया. हिंदू सनातन परंपरा में पिंडदान आमतौर पर मृत्यु के पश्चात आत्मा की शांति के लिए किया जाता है, लेकिन इस प्रतीकात्मक कदम ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है.
संघर्ष की कहानी, पति की मौत के बाद मोमोस बेचकर पाला परिवार
मिली जानकारी के अनुसार, पीड़ित महिला का विवाह वर्ष 2005 में बोकारो जिले के टेलीडीह क्षेत्र में हुआ था. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन वर्ष 2021 में पति के असमय निधन ने हंसते-खेलते परिवार को बिखेर कर रख दिया. परिवार में तीन बच्चों (दो बेटियां और एक बेटा) की जिम्मेदारी अकेले महिला के कंधों पर आ गई.

विपरीत परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय महिला ने हिम्मत दिखाई
महिला ने सड़क किनारे मोमोस का ठेला लगाना शुरू किया. दिन-रात धूप-छांव की परवाह किए बिना मेहनत कर पाई-पाई जोड़ी. उन्होंने बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी और अपनी बड़ी बेटी को स्नातक तक की शिक्षा दिलाई, ताकि वह समाज में सिर उठाकर जी सके. मां का सपना उस समय चकनाचूर हो गया जब 20 वर्षीय बड़ी बेटी ने एक ऐसा आत्मघाती सामाजिक फैसला लिया, जिसने परिवार की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दिया. बताया जा रहा है कि युवती ने अपने ही दूर के रिश्ते में लगने वाले एक व्यक्ति (जो रिश्ते में मौसा समान था) से प्रेम विवाह कर लिया. जब इस बात की जानकारी मां और परिजनों को हुई, तो उन्होंने लोक-लाज और पारिवारिक मर्यादा का हवाला देते हुए युवती को बहुत समझाने का प्रयास किया. लेकिन, समाज और मां के संघर्ष को दरकिनार कर बेटी अपने फैसले पर अडिग रही और उसने शादी कर ली.
आहत मां का कठोर कदम, गया जी में जाकर किया पिंडदान
बेटी के इस फैसले ने लोक-लाज और समाज में मां को इस कदर तोड़ दिया, कि उन्होंने अपनी बेटी को हमेशा के लिए मृत मान लिया. गहरी मानसिक और सामाजिक पीड़ा से गुजर रही मां अपने 6 वर्षीय छोटे बेटे को साथ लेकर बिहार के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल गया के विष्णुपद मंदिर पहुंची वहां उन्होंने धार्मिक रीति-रिवाज के साथ अपनी जीवित बेटी का प्रतीकात्मक रूप से पिंडदान और तर्पण कर दिया.
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