Ranchi: झारखंड सचिवालय सेवा के उच्च पदों के सृजन को लेकर कल होने वाली कैडर रिव्यू कमेटी की बैठक कल यानि 20 मई को होगी. फाइलों को पब्लिक करने और छिपे हुए दस्तावेजों को मेज पर लाने की मांग को लेकर सरकार और सचिवालय सेवा संघ के बीच आर-पार की स्थिति बन गई है. कमेटी में शामिल संघ के पदाधिकारियों ने जहां पूरी पारदर्शिता के साथ नीतिगत दस्तावेज मांगे हैं, इस बीच कल होने वाली बैठक बेहद निर्णायक मानी जा रही है, क्योंकि इसी टेबल पर उप सचिव के 46 और संयुक्त सचिव के 25 नए पदों के सृजन का भविष्य तय होना है.

विवाद का केंद्र बिंदु है दस्तावेज
कैडर रिव्यू कमेटी की पहली बैठक से ही विवाद का केंद्र बिंदु वह दस्तावेज बने हुए हैं. सदस्य के रूप में शामिल संघ के पदाधिकारियों ने कार्मिक विभाग से कई महत्वपूर्ण रिकॉर्ड्स मांगे हैं. इनमें सचिवालय सेवा की मूल नियमावली, विभिन्न विभागों द्वारा उप सचिव व संयुक्त सचिव पदों के लिए भेजी गई वास्तविक आवश्यकता की रिपोर्ट, और वर्ष 2010 के बाद से अब तक पद सृजन के लिए की गई कार्रवाई का ब्यौरा शामिल है. संघ उस नियमावली को भी देखना चाहता है जिसके तहत इस कमेटी का गठन हुआ है.
12 मई की बैठक का गणित: सिर्फ पब्लिक डेटा पर चर्चा
इससे पहले 12 मई को राजस्व परिषद के सदस्य मस्तराम मीणा की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में यह विवाद खुलकर सामने आया था. बैठक में वित्त सचिव प्रशांत कुमार, कार्मिक सचिव प्रवीण कुमार टोप्पो और राजस्व सचिव चंद्रशेखर के सामने संघ के अध्यक्ष रितेश कुमार व महासचिव राजेश कुमार सिंह ने विभागीय अभिलेखों और समीक्षा संचिकाओं को उपलब्ध कराने का पुरजोर अनुरोध किया था.
ALSO READ: हज के लिए तैयार दुनिया भर के मुसलमान, 25 मई से अहम अरकान
वैज्ञानिक फॉर्मूले पर जोर
सचिवालय सेवा संघ का स्पष्ट मत है कि कैडर रिव्यू महज एक कागजी औपचारिकता न बने. संघ ने मांग की है कि पदों का निर्धारण वर्तमान स्वीकृत संख्या के बजाय कार्यभार, प्रशासनिक विस्तार, नई नीतिगत आवश्यकताओं और भविष्य की जरूरतों के आधार पर एक वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ मेथडोलॉजी के तहत हो. बैठक में केंद्र सरकार और अन्य राज्यों की समान सेवाओं से झारखंड सचिवालय सेवा की तुलनात्मक स्थिति पर भी चर्चा हुई थी. कमेटी के अध्यक्ष ने संघ को इस पर अपना विस्तृत लिखित पक्ष सौंपने को कहा है, ताकि प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जा सके. अब सबकी नजरें कल होने वाली बैठक पर हैं कि क्या दोनों पक्ष इस गतिरोध को तोड़ पाते हैं या नहीं.
