हजारीबाग में कोल आंदोलन के बहाने बीजेपी में नई सियासी जंग: सांसद की घेराबंदी में जुटा नया गुट, प्रदीप-रोशन-भुनेश्वर की नजदीकी ने बढ़ाई हलचल

Hazaribagh: की राजनीति में कोल खनन और विस्थापन का आंदोलन अब सिर्फ जनसरोकार का मुद्दा नहीं रह गया है. बड़कागांव के विस्थापितों...

Hazaribagh: की राजनीति में कोल खनन और विस्थापन का आंदोलन अब सिर्फ जनसरोकार का मुद्दा नहीं रह गया है. बड़कागांव के विस्थापितों के समर्थन में हुए समाहरणालय घेराव ने बीजेपी के अंदर चल रही खामोश राजनीतिक लड़ाई को भी खुलकर सामने ला दिया है. सदर विधायक प्रदीप प्रसाद, बड़कागांव विधायक रोशन लाल चौधरी और पूर्व सांसद भुवनेश्वर मेहता का एक साथ मंच साझा करना अब महज संयोग नहीं माना जा रहा. राजनीतिक गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को सीधे तौर पर हजारीबाग सांसद मनीष जायसवाल की मजबूत घेराबंदी के रूप में देखा जा रहा है. खास बात यह है कि यह घेराबंदी पार्टी के भीतर से ही आकार लेती दिखाई दे रही है.

विस्थापितों के आंदोलन में छिपा राजनीतिक संदेश

समाहरणालय घेराव के दौरान नेताओं ने विस्थापितों के पुनर्वास, रोजगार और मुआवजे की मांग को जोरदार तरीके से उठाया. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर आंदोलन से ज्यादा मंच पर मौजूद चेहरों पर टिक गई. हजारीबाग की राजनीति में लंबे समय बाद ऐसा दृश्य देखने को मिला, जब बीजेपी के भीतर अलग-अलग धड़ों से जुड़े नेता एकजुट दिखाई दिए. खासकर सदर विधायक प्रदीप प्रसाद और बड़कागांव विधायक रोशन लाल चौधरी की बढ़ती नजदीकी ने यह संकेत दे दिया कि आने वाले दिनों में जिले की बीजेपी राजनीति में बड़ा ध्रुवीकरण संभव है.

क्या पहले से ही प्रदीप प्रसाद के खिलाफ थे सांसद?

बीजेपी के अंदरखाने की चर्चाओं में यह बात लंबे समय से कही जाती रही है कि सांसद मनीष जायसवाल कभी नहीं चाहते थे कि प्रदीप प्रसाद सदर सीट से विधायक बनें. सूत्रों की मानें तो विधानसभा चुनाव से पहले टिकट वितरण के समय भी प्रदीप प्रसाद का रास्ता रोकने की कोशिश हुई थी. चर्चा यह भी रही कि सांसद खेमे की ओर से एक रेल अधिकारी की पत्नी, जो चुनाव से ठीक पहले हजारीबाग की राजनीति में सक्रिय हुई थीं, उन्हें टिकट दिलाने की रणनीति बनाई जा रही थी. हालांकि अंततः पार्टी नेतृत्व ने प्रदीप प्रसाद पर भरोसा जताया और वह चुनाव जीतकर सदर विधायक बने. यही वजह है कि चुनाव जीतने के बाद भी सांसद और विधायक के बीच राजनीतिक दूरी कभी कम नहीं हुई.

क्रिकेट विवाद ने बढ़ाई तल्खी

दोनों नेताओं के बीच तनाव पहली बार खुलकर तब सामने आया जब हजारीबाग में क्रिकेट आयोजन को लेकर विवाद हुआ. उस दौरान विधायक प्रदीप प्रसाद ने क्रिकेट ग्राउंड में खुलकर विरोध दर्ज कराया था. राजनीतिक हलकों में चर्चा रही कि सांसद मनीष जायसवाल ने उस पूरे विवाद में विधायक को अपेक्षित महत्व नहीं दिया. आरोप यह भी लगा कि विधायक की आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए सांसद ने उन्हें सार्वजनिक तौर पर “उदंड” साबित करने की कोशिश की. यहीं से प्रदीप प्रसाद का तेवर और अधिक आक्रामक होता चला गया. इसके बाद कई मंचों से विधायक ने अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से सांसद के खिलाफ मुखर रुख अपनाना शुरू कर दिया.

प्रदेश और जिला नेतृत्व की चुप्पी क्या संकेत दे रही?

सबसे दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी का प्रदेश और जिला नेतृत्व अब तक इस बढ़ती अंदरूनी खींचतान पर लगभग खामोश बना हुआ है.राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह चुप्पी भी कई संकेत दे रही है.पार्टी के भीतर एक ऐसा गुट आकार ले रहा है जो सांसद की कार्यशैली से असहज बताया जा रहा है. बड़कागांव आंदोलन में प्रदीप प्रसाद, रोशन लाल चौधरी और भुनेश्वर मेहता की एकजुटता को उसी रणनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. पूर्व सांसद भुनेश्वर मेहता की सक्रिय मौजूदगी ने इस पूरे समीकरण को और दिलचस्प बना दिया है. वामपंथी पृष्ठभूमि से आने वाले भुनेश्वर मेहता लंबे समय से जन आंदोलनों की राजनीति करते रहे हैं और उनकी मौजूदगी ने आंदोलन को राजनीतिक वजन देने का काम किया.

 कोल बेल्ट की राजनीति में नया ध्रुवीकरण

बड़कागांव, केरेडारी और आसपास का कोल बेल्ट हमेशा से राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाका रहा है. विस्थापन, जमीन अधिग्रहण और रोजगार जैसे मुद्दे यहां चुनावी समीकरण बदलने की ताकत रखते हैं. ऐसे में यदि विस्थापितों के मुद्दे पर विपक्ष के बजाय बीजेपी के भीतर ही अलग स्वर उभरने लगें, तो इसका असर आने वाले चुनावों में सीधे दिखाई दे सकता है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी नेतृत्व ने समय रहते अंदरूनी मतभेदों को नहीं संभाला, तो हजारीबाग जैसी पारंपरिक सीटों पर भी बीजेपी को संघर्ष करना पड़ सकता है.

आने वाले दिनों में और तेज होगी सियासत

फिलहाल कोल आंदोलन ने एक बात साफ कर दी है कि हजारीबाग बीजेपी की राजनीति अब एकध्रुवीय नहीं रह गई है. सांसद के समानांतर एक नया शक्ति केंद्र उभरता दिखाई दे रहा है, जिसमें जन आंदोलनों की राजनीति, स्थानीय असंतोष और अंदरूनी गुटबाजी तीनों का मिश्रण नजर आ रहा है. अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि पार्टी नेतृत्व इस बढ़ती सियासी खींचतान को कैसे संभालता है  क्योंकि आने वाले दिनों में यह टकराव और खुलकर सामने आने के संकेत दे रहा है.

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