Hazaribagh : जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों खुद गंभीर संकट से गुजरती नजर आ रही है. सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला इतना बड़ा हो चुका है कि अब इसका असर सीधे गरीब मरीजों और उनके परिजनों की जिंदगी पर पड़ने लगा है. हजारीबाग के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल से सामने आई एक तस्वीर ने पूरे स्वास्थ्य महकमे की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. अस्पताल परिसर में 108 एंबुलेंस को धक्का मारकर स्टार्ट करते चालक और कर्मियों का दृश्य सिर्फ एक खराब गाड़ी की कहानी नहीं, बल्कि जिले की चरमराई चिकित्सा व्यवस्था का आईना बन गया है. जिस एंबुलेंस सेवा को गंभीर मरीजों की “जीवन रेखा” कहा जाता है, वही अब खुद दूसरों के सहारे चलने को मजबूर है.

“हाईटेक स्वास्थ्य सेवा” के दावों की खुली पोल
एक ओर राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और बेहतर आपातकालीन सेवाओं के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, दूसरी ओर अस्पतालों की वास्तविक स्थिति उन दावों की परतें खोल रही है. शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल, जहां हर दिन सैकड़ों मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां मूलभूत व्यवस्थाएं तक दम तोड़ती दिखाई दे रही हैं. स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी द्वारा लगातार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की बात कही जाती रही है, लेकिन अस्पताल परिसर में धक्का मारकर स्टार्ट की जा रही 108 एंबुलेंस ने इन दावों को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है. आम लोगों का कहना है कि जब आपातकालीन सेवा की गाड़ियां ही भरोसेमंद नहीं रहीं, तो मरीजों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है.
जिले की 35 में से 20 से अधिक एंबुलेंस की बैटरियां खराब
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, हजारीबाग जिले में करीब 35 “108 आपातकालीन एंबुलेंस” संचालित हैं. इनमें से कई एंबुलेंस लंबे समय से खराब हालत में पड़ी हैं. सबसे गंभीर बात यह है कि 20 से अधिक एंबुलेंस की बैटरियां पूरी तरह जवाब दे चुकी हैं. कई गाड़ियों को धक्का देकर स्टार्ट करना पड़ रहा है, जबकि कुछ एंबुलेंस बीच रास्ते में बंद हो जाने के डर से चालक खुद दहशत में रहते हैं. यह स्थिति सिर्फ तकनीकी लापरवाही नहीं, बल्कि मरीजों की जिंदगी के साथ खुला खिलवाड़ मानी जा रही है. अगर किसी गंभीर मरीज को रेफर करते समय रास्ते में एंबुलेंस बंद हो जाए और समय पर इलाज नहीं मिल पाए, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
मरीजों और परिजनों की बढ़ती परेशानी
अस्पताल आने वाले मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि पहले ही सरकारी अस्पतालों में इलाज, जांच और दवाइयों को लेकर भारी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं. ऊपर से एंबुलेंस जैसी जरूरी सेवा भी बदहाल हो चुकी है. ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब मरीज 108 सेवा को अंतिम सहारा मानते हैं, लेकिन जब वही सेवा समय पर उपलब्ध न हो या खराब हालत में मिले, तो मरीजों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है. कई परिजनों ने आरोप लगाया कि घंटों इंतजार के बावजूद समय पर एंबुलेंस नहीं मिलती, और मिलने पर भी उसकी स्थिति देखकर डर लगता है कि कहीं रास्ते में बंद न हो जाए.
अस्पताल प्रबंधन और विभागीय अधिकारियों पर उठ रहे सवाल
पूरे मामले में अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. आखिर इतनी बड़ी संख्या में एंबुलेंस की बैटरियां खराब कैसे हो गईं? समय रहते उनकी मरम्मत क्यों नहीं कराई गई? क्या विभागीय अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं? लोगों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग में जवाबदेही पूरी तरह खत्म हो चुकी है. अधिकारियों की लापरवाही और संवेदनहीनता का खामियाजा आम जनता भुगत रही है. करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अगर मरीजों को बुनियादी सुविधा तक न मिले, तो यह पूरे सिस्टम की विफलता है.
“मंत्री जी कुछ तो करिए” जनता में बढ़ता आक्रोश
स्वास्थ्य व्यवस्था की इस बदहाली को लेकर लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है. आम जनता का कहना है कि अगर सरकार वास्तव में बेहतर स्वास्थ्य सेवा देना चाहती है, तो सबसे पहले जमीनी स्तर पर व्यवस्थाओं को दुरुस्त करना होगा. लोगों का कहना है कि सिर्फ घोषणाओं और भाषणों से स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं सुधरेगी. अस्पतालों में संसाधनों की निगरानी, एंबुलेंस की नियमित जांच और जवाबदेही तय करना जरूरी है. जनता अब जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से ठोस कार्रवाई की मांग कर रही है. अगर हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी बड़ा असर डाल सकता है. क्योंकि सवाल अब सिर्फ एक एंबुलेंस का नहीं, बल्कि हजारों मरीजों की जिंदगी और पूरे स्वास्थ्य सिस्टम की विश्वसनीयता का है.
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