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मसनोडीह के आम की मांग विदेश तक, बगान संचालकों ने कहा – हर साल मिलते है ऑर्डर

Koderma : छह दशक से अधिक समय से कोडरमा के डोमचांच प्रखंड अंतर्गत मसनोडीह में स्वादिष्ट आमों का उत्पादन हो रहा है....

Koderma : छह दशक से अधिक समय से कोडरमा के डोमचांच प्रखंड अंतर्गत मसनोडीह में स्वादिष्ट आमों का उत्पादन हो रहा है. यहां उत्पादित आम अपनी मिठास से नई पहचान गढ़ रहा है. यहां के आम की देश से लेकर विदेशो तक मांग है.
रोहित कुमार नामक युवक ने बताया कि कोडरमा के मसनोडीह का नाम आज क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध आम बागानों में शुमार हो चुका है. डोमचांच के मसनोडीह गांव के आम बागान इन दिनों अपने खास स्वाद को लेकर गुलजार है. सिर्फ मसनोडीह में ही 10 आम बगानों में तकरीबन तीन हजार से ज्यादा पेड़ है. जो फलों से लदे पड़े है और फिलहाल यहां के पेड़ में पका की काफी डिमांड है.

आम की खरीदारी करते लोग

किसी कमिकल का इस्तेमाल नहीं होता

आम बगान संचालक विनय सिंह ने बताया कि यह आम बाजारों में मिलने वाले आम से अलग स्वास्थय के दृष्टीकोण से अच्छा होने के साथ स्वाद में भी बेहतर है. क्योंकि इसे पकाने और स्वादिष्ट बनाने के लिए किसी केमिकल का इस्तेमाल नही होता है. मसनोडीह में इन दिनों फलों के राजा आम की खरीदारी के दुर दुर से पहुंचने वाले खरीदार के अलावे फोन पर मिलने वाले डिमांड पर आम की तोड़ाई की जा रही है. यहां हर बागान में सैकड़ों आम के पेड़ हैं. जिनमें एक दर्जन से अधिक प्रजाति के आम हैं.

दिल्ली के साथ विदेशों में डिमांड

एक अन्य आम बगान संचालक रमाकांत सिंह ने कहा कि यहां लोगों को सीधे पेड़ पर पके हुए ताजे आम मिलते हैं. यही वजह है कि रांची और पटना से भी लोग आम खरीदने आते है. दूसरे प्रदेशों के ग्राहक को ट्रेन और बस के माध्यम से ऑर्डर पर डिमांड भेजा जाता है. बागान की देखरेख कर रहे राजू मेहता ने बताया कि मसनोडीह का आम अब केवल कोडरमा या झारखंड तक सीमित नहीं है. यहां के आम दिल्ली तक भेजे जा चुके हैं. इतना ही नहीं पिछले वर्ष कोडरमा के एक व्यक्ति ने अमेरिका में रहने वाले परिजनों के लिए 30 किलो आम मंगवाया था और इसबार भी मंगवाया है. उन्होंने बताया कि पूरे बागान की सुरक्षा के लिए 24 घंटे निगरानी की व्यवस्था की गई है.

इन आमों के हैं बगान

मसनोडीह के इन पेड़ों में मालदा, जर्दालू, गुलाब खास, बम्बईया, हिमसागर, किशुन भोग, बेलखास, मणिका, सीपिया, फ़ज़ली समेत अचार के लिए सुकूल आम भी हैं. तकरीबन 6 दशक पहले यहां के जमींदार स्व धर्मनारायण सिंह ने बंगाल के ग्लोबल नर्सरी से आम के पौधे मंगाकर लगाए गए थे और आज उस जमींदार परिवार की चौथी पीढ़ी आम का स्वाद चखने के साथ आर्थिक उपार्जन भी कर रहा है.

 

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