palamu : जिले के रामगढ़ प्रखंड से अंधविश्वास नहीं बल्कि बीमारी और बेबसी की एक ऐसी खौफनाक दास्तान सामने आई है, जो किसी भी संवेदनशील दिल को झकझोर कर रख देगी. पलामू मुख्यालय मेदिनीनगर से महज 45 किलोमीटर दूर हुंटार पंचायत का ढोढराही गांव आज अपनी एक नई और दर्दनाक पहचान के आंसू रो रहा है. करीब 25 परिवारों की आबादी वाले इस अनुसूचित जाति बहुल गांव को आज आसपास के लोग ‘विधवाओं का गांव’ कहने लगे हैं. इस गांव की गलियों में कदम रखते ही सन्नाटा और बेबसी साफ महसूस की जा सकती है, जहां अब सिर्फ लाचार महिलाएं और मासूम बच्चे ही नजर आते हैं. इस तबाही के पीछे कोई दैवीय प्रकोप नहीं, बल्कि टीबी यानी ट्यूबरक्लोसिस जैसी जानलेवा बीमारी है, जिसने पिछले एक दशक में एक-एक कर इस गांव के 20 से अधिक शादीशुदा पुरुषों को मौत की नींद सुला दिया. देखते ही देखते 20 से ज्यादा हंसते-खेलते परिवार पूरी तरह तबाह हो गए और महिलाएं वक्त से पहले विधवा हो गईं.
जिंदगी और मौत की जंग
हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि कुछ महिलाओं ने अपने पतियों की मौत के बाद बच्चों के भविष्य की खातिर अपने आशियाने पर ताला जड़ दिया और इस अभिशप्त गांव को हमेशा के लिए छोड़ दिया. इस दर्दनाक दास्तान की शुरुआत साल 2013-14 में हुई थी, जब पेट की आग बुझाने और आजीविका की तलाश में इस गांव के पुरुषों ने बिहार के रोहतास जिले के करवंदिया इलाके में पलायन करना शुरू किया था. वहां ये मजदूर स्टोन माइंस यानी पत्थर खदानों में कड़ा श्रम करते थे. खदानों से उड़ने वाली सिलिका डस्ट और धूल के बारीक कणों के बीच काम करने के कारण धीरे-धीरे इनके फेफड़े खोखले होने लगे. साल 2016-17 आते-आते इस जानलेवा बीमारी ने अपना रंग दिखाना शुरू किया और खदानों से बीमार होकर लौटे पुरुषों की मौत का सिलसिला जो शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस बीमारी की मार ने पिछले कुछ वर्षों में बीरेंद्र भुईयां, बितन भुईयां, सुकन भुईयां, रामराज भुईयां, बंशी भुईयां, भिखारी भुईयां, परमेश्वर भुईयां, भोदा भुईयां, श्रवण भुईयां और पचू भुईयां समेत कई ग्रामीणों को असमय ही मौत के गाल में धकेल दिया. आज भी गांव में बचा एक मात्र वयस्क पुरुष टीबी की इसी भयानक बीमारी से जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा है.

सिर्फ गांव के पुरुष ही हुए शिकार
चौंकाने वाली बात यह है कि इस जानलेवा बीमारी का शिकार सिर्फ गांव के पुरुष ही हुए हैं, जबकि किसी भी महिला या बच्चे में अब तक टीबी से ग्रसित होने या मौत होने की पुष्टि नहीं हुई है. पतियों की मौत के बाद अब इन बेसहारा परिवारों को पालने की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई है. पेट पालने के लिए ये महिलाएं अब स्थानीय स्तर पर मजदूरी करने और ईंट भट्टों पर हाड़-तोड़ काम करने को मजबूर हैं. विडंबना देखिए कि स्कूल जाने की उम्र में इस गांव के कई मासूम बच्चे भी अपनी मां का हाथ बंटाने के लिए बाल मजदूरी के दलदल में धकेल दिए गए हैं. इस पूरे मामले पर जब स्वास्थ्य महकमे की सुस्ती को टटोला गया, तो पता चला कि साल 2022 में इस गांव में एक सरकारी सर्वे और जांच कैंप का आयोजन किया गया था, जिसमें तीन टीबी के सक्रिय मरीज पाए गए थे. लेकिन बेहद अफसोस की बात है कि साल 2022 के बाद स्वास्थ्य विभाग ने इस गांव की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा.
सिर्फ पुरुषों की मौत से गांव में दहशत, स्वास्थ्य विभाग करेगा जांच
बीते चार सालों में न तो यहां कोई मेडिकल कैंप लगाया गया और न ही दोबारा किसी की टीबी जांच की गई. इन पीड़ित परिवारों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने या इनके पुनर्वास के लिए अब तक प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं हुई है. इसके अलावा इलाके में जागरूकता की कमी के कारण पुरुषों में शराब के अत्यधिक सेवन की लत भी इस स्थिति को और गंभीर बना रही है. पूरे मामले पर पलामू के सिविल सर्जन का कहना है कि साल 2022 में ग्रामीणों की जांच की गई थी जिसमें टीबी के मरीज मिले थे. हालांकि उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पिछले कई वर्षों में सिर्फ पुरुषों की ही मौत होना केवल टीबी का कारण नहीं माना जा सकता. इसके पीछे पत्थर खदानों में काम करना और अत्यधिक शराब का सेवन भी एक बड़ी वजह हो सकती है. सिविल सर्जन ने आश्वासन दिया है कि स्वास्थ्य विभाग की एक विशेष टीम जल्द ही एक बार फिर ढोढराही टोला का दौरा करेगी और गहन जांच करेगी कि आखिर यह किस तरह की बीमारी है जिसने सिर्फ पुरुषों को ही अपना निशाना बनाया है.
पीड़ित परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ
बहरहाल, सरकारी दफ्तरों में दावों और दलीलों का दौर चाहे जो भी हो, लेकिन धरातल की कड़वी सच्चाई यही है कि ढोढराही टोला के पुरुषों की मौत बीमारी की वजह से ही हुई है. आज यह पूरा टोला पुरुषों से विहीन हो चुका है और यहां की विधवा महिलाएं और बच्चे पूरी तरह बेसहारा हो चुके हैं. अब वक्त आ गया है जब जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार को अपनी गहरी नींद से जागना होगा. इस सुदूरवर्ती और उपेक्षित इलाके में जाकर न सिर्फ स्वास्थ्य सुविधाओं को मुस्तैद करना होगा, बल्कि पीड़ित परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ देकर उनके भविष्य को सुरक्षित करना होगा, ताकि इस गांव में किसी और मासूम का बचपन अनाथ न हो और किसी और मांग का सिंदूर न उजड़े.
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