Hazaribagh: सुपरस्टार प्रभास की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘सालार’ तो आपने देखी ही होगी. उस फिल्म में एक खूंखार साम्राज्य था ‘खानसार’, जहां एक खास ‘सिंह’ (लायन) के निशान वाली सील चलती थी. नियम बड़ा साधारण मगर क्रूर था-जिस गाड़ी या जिस इंसान पर वो सिंह का निशान लग गया, उसे रोकने या टोकने की हिम्मत पूरे साम्राज्य में किसी में नहीं होती थी. कुछ ऐसा ही फिल्मी और रोंगटे खड़े कर देने वाला सस्पेंस इस समय हजारीबाग के केरेडारी स्थित एनटीपीसी कोल परियोजना (केडी माइंस) में धरातल पर तैर रहा है. सुरक्षा के बड़े-बड़े दावों और सीसीटीवी कैमरों की निगरानी के बीच, केडी माइंस के भीतर एक ऐसा ही समानांतर अंडरग्राउंड सिंडिकेट सक्रिय है, जिसका खुद का एक ‘जादुई कोड वर्ड’ चलता है. खेल इतना बड़ा है कि इस चक्रव्यूह के दम पर हर महीने लगभग 25 लाख (24,96,000) रुपये और रोजाना करीब 83,200 रुपये की कथित अवैध उगाही की जा रही है, लेकिन असली सस्पेंस गाड़ियों के शीशे पर आकर थमता है.
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SGP यानी नो-स्टॉपेज वीआईपी पास, हुक्म टाला तो दो दिन का टॉर्चर
केडी माइंस में एंट्री करने वाले लगभग 200 बाहरी हाइवा मालिकों के लिए यहां एक अघोषित ‘खानसार’ वाला नियम लागू है. जब तक गाड़ियों के आगे तीन अक्षरों का एक खास स्टीकर—’SGP’ (समसुल ग्रुप पाण्डु) नहीं चिपक जाता, तब तक स्थानीय दबंगों का यह सिंडिकेट उस गाड़ी को हिलाने तक नहीं देता. जैसे ही यह जादुई स्टीकर शीशे पर आता है, सारे नियम-कानून और सुरक्षा घेरे इस स्टीकर के आगे नतमस्तक हो जाते हैं, गाड़ी को बिना किसी रोक-टोक के तुरंत लोडिंग स्लिप मिल जाती है. लेकिन, अगर किसी वाहन मालिक ने इस अदृश्य हुक्म को मानने से इनकार किया, तो उसके साथ प्रताड़ना का ऐसा दौर शुरू होता है कि वह पानी मांगने लगता है. पीड़ित एक हाइवा मालिक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि इस प्रताड़ना से तंग आकर वे अपनी गाड़ी ही वापस ले आए, क्योंकि सिंडिकेट का साफ नियम था कि गाड़ी चलानी है तो ग्रुप की गुलामी करनी होगी, वरना दो-दो दिन तक लोडिंग के लिए गाड़ी को धूप में तरसा दिया जाएगा. वर्तमान में पंजीकृत 350 गाड़ियों में से 50 स्थानीय वाहनों को छोड़कर बाकी 200 गाड़ियां इस अदृश्य जाल में पूरी तरह फंसी हुई हैं.
भाड़े से कटता है ‘गुंडा टैक्स’: प्रति टन वसूली के गणित में बड़ी कंपनी भी रडार पर
इस सिंडिकेट का आर्थिक ताना-बाना इतना अचूक और शातिर है कि देखने वाले भी दंग हैं. टंडवा पावर प्लांट की लोडिंग पर प्रति टन 3 रुपये और टोरी साइडिंग की लोडिंग पर प्रति टन 10 रुपये का अवैध ‘नजराना’ फिक्स है. औसतन 32 टन क्षमता वाले एक हाइवा को टंडवा के लिए 96 रुपये और टोरी साइडिंग के लिए रोज 320 रुपये चुकाने पड़ते हैं. यानी हर हाइवा मालिक की जेब से रोज 416 रुपये और महीने में कुल 12,480 रुपये की सीधी डकैती डाली जा रही है. इस कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि यह पैसा नकद नहीं लिया जाता ताकि कोई सबूत न बचे. आरोप है कि ट्रांसपोर्टिंग कंपनी ‘नकास सर्विसेज’ सीधे हाइवा मालिकों के तय भाड़े से यह राशि काटकर वसूली ग्रुप के बैंक खातों में ट्रांसफर कर देती है. हालांकि, नकास कंपनी के लाइजनर विकास जैन ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि वे सिर्फ फील्ड ड्यूटी देखते हैं और सारा पेमेंट दुर्गापुर मुख्य कार्यालय से होता है, इसलिए उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है.
माओवादी फंडिंग, आपराधिक इतिहास और सच दिखाने वाले पत्रकारों पर हमला
जैसे-जैसे इस खोजी रिपोर्ट की परतें खुल रही हैं, सस्पेंस अब सीधे देश की सुरक्षा व्यवस्था से जाकर टकरा रहा है. खुफिया सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, इस ‘SGP’ गैंग के मुखिया मो. शमसुल पर आरोप है कि इस अवैध वसूली से प्राप्त राशि का एक बड़ा हिस्सा प्रतिबंधित माओवादी संगठनों और अंतर्राज्यीय गैंगस्टरों तक पहुंचाया जाता है, जिसके लिए कई संदिग्ध फोन कॉल्स भी आते हैं. सूत्रों के मुताबिक, मो. शमसुल का इतिहास पूर्व में भी चोरी, आगजनी, मारपीट और कई आपराधिक घटनाओं से जुड़ा रहा है और विभिन्न थानों में उनके खिलाफ कई मामले दर्ज होने की चर्चा है. सबसे नया मोड़ यह है कि जब इस सिंडिकेट के काले कारनामों को मीडिया ने पूरी मुस्तैदी से उजागर करना शुरू किया, तो अपनी छवि बचाने के लिए मो. शमसुल द्वारा कथित तौर पर क्षेत्रीय पत्रकारों और मीडिया कर्मियों को ही निशाना बनाने, उन्हें बदनाम करने और मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की एक नई साजिश रची जा रही है ताकि सच को हमेशा के लिए दबाया जा सके.
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क्या सो रहा था परियोजना प्रबंधन? अब पुलिस की कड़क एंट्री
करोड़ों के इस समानांतर नेटवर्क ने अब सबसे बड़ा सवाल एनटीपीसी कोल परियोजना के प्रबंधन, वहां तैनात सुरक्षा एजेंसियों और जिम्मेदार अधिकारियों पर खड़ा कर दिया है. क्या प्रतिदिन सैकड़ों वाहनों के बीच चल रहे इस लाखों के खेल से अधिकारी पूरी तरह बेखबर थे, या फिर निगरानी तंत्र पूरी तरह बिक चुका था? हालांकि, दूसरी तरफ आरोपी ग्रुप के लीडर शमसुल ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए दावा किया है कि उनका ग्रुप रजिस्टर्ड है और उन्हें नकास कंपनी से बकायदा वर्क ऑर्डर मिला हुआ है, और वे वाहन मालिकों की सहमति से केवल ‘मेहनतनामा’ लेते हैं. बहरहाल, इस पूरे हाई-प्रोफाइल मामले में बड़कागांव के एसडीपीओ अमित आनंद की कड़क एंट्री हो चुकी है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में एलान किया है कि यह मामला उनके संज्ञान में आते ही जांच के आदेश दे दिए गए हैं. क्षेत्र में कोई भी अवैध वसूली का खेल बर्दाश्त नहीं होगा और संदिग्धों के मोबाइल कॉल डिटेल्स व बैंक खातों की गहन जांच कर इस सिंडिकेट के पीछे छिपे हर सफेदपोश और अपराधी को सलाखों के पीछे भेजा जाएगा.
