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EXCLUSIVE : कागजों में न पेड़ उगेंगे और न ही फाइलों में बनेंगे चेकडैम, ‘कैंपा फंड’ के अरबों रुपयों का होगा हिसाब, सरकार कसेगी वन अधिकारियों की नकेल

Ranchi : झारखंड के जंगलों की हरियाली और वन्यजीवों के संरक्षण के नाम पर हर साल बहने वाली सरकारी राशि का अब...

Ranchi : झारखंड के जंगलों की हरियाली और वन्यजीवों के संरक्षण के नाम पर हर साल बहने वाली सरकारी राशि का अब आर-पार का हिसाब होने जा रहा है. राज्य सरकार ने कैंपा के तहत वित्तीय वर्ष 2025-26 और 2026-27 में हुए सभी कार्यों के व्यापक मूल्यांकन का फैसला किया है. इसके लिए विभाग ने एक थर्ड पार्टी इवैल्यूएशन एजेंसी (तीसरी स्वतंत्र संस्था) की बहाली के लिए आधिकारिक प्रस्ताव (RFP) जारी कर दिया है.

अब केवल कागजों पर न पेड़ उगेंगे और न ही फाइलों में बनेंगे चेकडैम

सरकार ने स्पष्ट किया है कि अब केवल कागजों पर पेड़ नहीं उगेंगे और न ही फाइलों में चेकडैम बनेंगे. सरकार की इस पैनी नजर से वन महकमे के उन अधिकारियों और संवेदकों में हड़कंप मच गया है, जो अब तक सरकारी फंड को केवल ठिकाने लगाने में माहिर माने जाते थे.

क्या है सरकार का मास्टरप्लान

झारखंड में उद्योगों, खनन और अन्य गैर-वानिकी कार्यों के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई होती है. इस नुकसान की भरपाई के लिए कंपनियां सरकार को भारी भरकम राशि नेट प्रेजेंट वैल्यू के तहत देती हैं. जिसे कैंपा फंड में जमा किया जाता है. नियम के मुताबिक, इस पैसे का उपयोग नए सिरे से पौधारोपण करने, जल संरचनाएं बनाने और वन्यजीवों के पर्यावास को सुधारने के लिए किया जाना है. लेकिन, जमीन पर इसका क्या असर हुआ? क्या वाकई नए जंगल उगे या करोड़ों रुपये फाइलों के गर्त में समा गए? इसी सच को सामने लाने के लिए विभाग ने 10 फीसदी रैंडम सैंपलिंग के आधार पर पूरे राज्य में फैले 49 वन प्रमंडलों की घेराबंदी शुरू कर दी है.

इन कार्यों की होगी जांच

ब्लॉक और लीनियर पौधारोपण : कागजों पर लाखों पौधे लगाने का दावा करने वाले प्रमंडलों की पोल अब खुलने वाली है. एजेंसी हर 10वीं कतार के पौधों की गिनती करेगी. पौधों की जीवित रहने की दर, उनकी ऊंचाई और मोटाई को नापा जाएगा.

सॉयल एंड मॉइस्चर कंजर्वेशन वर्क्स : जंगलों में मिट्टी के कटाव को रोकने और पानी को सहेजने के लिए बनाये गए चेकडैम, जलप्रपात और वॉटर होल्स की वास्तविक चौड़ाई, गहराई और लंबाई मापी जाएगी. इसमें रिकॉर्ड और वास्तविकता के बीच 0 फीसदी सहिष्णुता की नीति अपनाई जाएगी. इसके साथ ही गाद के स्तर को भी देखा जाएगा.

वन्यजीव प्रबंधन और मानव-पशु द्वंद : हाथियों के प्रकोप को रोकने के लिए किए गए एंटी-डिप्रेडेशन उपायों, गश्ती दलों की प्रभावशीलता और कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट प्लान के तहत किए गए कार्यों का असर देखा जाएगा कि क्या स्थानीय ग्रामीणों को इसका वाकई लाभ मिला है या नहीं.

हाईटेक नर्सरी और बुनियादी ढांचा : विभागीय भवनों, वन सड़कों, कल्वर्ट और वॉच टावरों के निर्माण की गुणवत्ता देखी जाएगी. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या इन सभी संपत्तियों को ई-ग्रीन वॉच पर जीपीएस कोऑर्डिनेट्स के साथ अपलोड किया गया है या नहीं, इसकी भी पड़ताल होगी.

गड़बड़ी की गुंजाइश खत्म : इस बार भ्रष्ट अधिकारियों के लिए बच निकलना नामुमकिन होगा, क्योंकि जांच प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और अचूक बनाया गया है. हर निरीक्षण स्थल की कम से कम 3 अलग-अलग कोणों से तस्वीरें ली जायेगी. जिनमें अनिवार्य रूप से देशांतर-अक्षांश और तारीख दर्ज होगी. जांच एजेंसी हर रेंज, प्रमंडल और रीजन को उनके काम के आधार पर अंक देगी. जो प्रमंडल फिसड्डी साबित होगा, उसके खिलाफ कार्रवाई तय है-

ग्रामीणों का सीधा इंटरव्यू

संयुक्त वन प्रबंधन समितियों और कम से कम 10 स्थानीय परिवारों से सीधे बातचीत कर यह पता लगाया जाएगा कि योजना का लाभ जनता तक पहुंचा या नहीं. सरकार ने सिर्फ वन अधिकारियों पर ही नहीं, बल्कि जांच करने आने वाली एजेंसी पर भी कड़ा चाबुक चलाया है. एजेंसी को अनुबंध मिलने के 1 महीने के भीतर इंसेप्शन रिपोर्ट, 3 महीने में मिड-टर्म रिपोर्ट, 5 महीने में ड्राफ्ट रिपोर्ट और 6 महीने के भीतर फाइनल रिपोर्ट सौंपनी होगी. यदि एजेंसी काम में देरी करती है, संसाधनों की कमी रखती है या गुणवत्ता खराब देती है, तो उस पर प्रति पखवाड़ा (15 दिन) 2 फीसदी  की दर से जुर्माना लगाया जाएगा. यदि देरी 2 महीने से अधिक हुई, तो ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा.

 

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