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द बोडम बाजार फाइल्स: ढाई सौ साल पुराना वो नक्शा और हजारीबाग के दिल में छुपा एक ब्रिटिश फौजी का राज

Hazariabgh: रात के सन्नाटे में जब हजारीबाग की सड़कें सो जाती हैं, तब शहर के बिल्कुल केंद्र में बसी एक जगह की...

Hazariabgh: रात के सन्नाटे में जब हजारीबाग की सड़कें सो जाती हैं, तब शहर के बिल्कुल केंद्र में बसी एक जगह की खामोशी से गुज़रो, तो ऐसा लगता है जैसे इतिहास खुद आपसे कुछ कहना चाह रहा हो. सीधी कतारों में कटी गलियां, एक-दूसरे को समकोण पर काटते रास्ते और सदियों पुरानी इमारतों के अवशेष. यह कोई आम बाज़ार नहीं है, यह हजारीबाग की धड़कन है-‘बोडम बाजार’. ​लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज जहां दिन भर हजारों कदमों की चहल-पहल और करोड़ों का व्यापार होता है, उसका ताना-बाना आज से ठीक 236 साल पहले एक बेहद रहस्यमयी और खुफिया रणनीति के तहत बुना गया था.

वर्ष 1790 और जंगलों के बीच वो खुफिया मिशन

​तारीख और साल इतिहास की किताबों में धुंधले हैं, लेकिन मंजर बिल्कुल साफ है. छोटानागपुर का पठार, चारों तरफ फैले घने और खूंखार जंगल, जंगली जानवरों की गूंज और उनके बीच ब्रिटिश हुकूमत की एक बेहद खास सैन्य टुकड़ी-‘रामगढ़ बटालियन’. अंग्रेजों को इस पूरे इलाके पर कंट्रोल करने के लिए एक ऐसे खुफिया और रणनीतिक मिलिट्री बेस की तलाश थी, जहां से पूरे छोटानागपुर पर नजर रखी जा सक. ​तभी घने जंगलों को चीरते हुए एक ब्रिटिश मिलिट्री अधिकारी की एंट्री होती है. नाम था-कैप्टन बोडम उन्हें जिम्मेदारी मिली इस वीरान पठार पर एक ऐसी छावनी खड़ी करने की, जो अभेद्य हो. लेकिन कैप्टन बोडम के दिमाग में सिर्फ फौजियों के बैरक नहीं, बल्कि एक आलीशान और व्यवस्थित शहर का नक्शा घूम रहा था.

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एक फौजी का दिमाग और वो अनोखा चक्रव्यूह

​कैप्टन बोडम ने जब हजारीबाग की जमीन पर कदम रखा, तो उन्होंने अपनी जेब से एक नक्शा निकाला. वो नक्शा कोई आम नक्शा नहीं था, बल्कि उस दौर के भारत के लिए एक अजूबा था. उस जमाने में भारत के बाजार संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी और उलझी हुई गलियों के लिए जाने जाते थे. लेकिन कैप्टन बोडम ने यहाँ एक ‘चक्रव्यूह’ रचा. ​उन्होंने पूरे इलाके को ‘ग्रिड पैटर्न’ पर डिजाइन किया. यानी शतरंज की बिसात की तरह बिल्कुल समानांतर और सीधी सड़कें, जो एक-दूसरे को 90 डिग्री के कोण पर काटती थीं. इसके पीछे एक गहरा सस्पेंस था अगर कभी छावनी पर कोई हमला हो या बगावत हो, तो ब्रिटिश तोपें और घुड़सवार सीधे एक छोर से दूसरे छोर तक बिना किसी रुकावट के दौड़ सकें. इसी मिलिट्री मास्टरप्लान के केंद्र में बसाया गया एक नागरिक बाजार, जिसका नाम कैप्टन के नाम पर पड़ा ‘बोडम बाजार’.

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​बंदूक की नोल से लेकर तराजू के पलड़े तक का सफर

​वक्त बदला, सदियां गुजरीं और धीरे-धीरे ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी सैन्य प्राथमिकताएं बदल दीं. हजारीबाग से सक्रिय सेना की टुकड़ियां धीरे-धीरे कूच कर गईं. जो लोग सोच रहे थे कि सेना के जाते ही कैप्टन बोडम का यह शहर और बाज़ार उजाड़ हो जाएगा, कहानी में वहीं सबसे बड़ा ट्विस्ट आया. ​बंदूकधारियों और घोड़ों की टापों की जगह स्थानीय व्यापारियों, कारीगरों और दूर-दराज से आए सौदागरों ने ले ली. कैप्टन बोडम का बनाया हुआ वो अनुशासित मिलिट्री ग्रिड, रातों-रात कपड़ों के थोक व्यापार, सुगंधित मसालों की खुशबू, चमचमाते बर्तनों और अनाज की विशाल मंडियों में तब्दील हो गया. जो गलियां कभी फौजियों के बूटों की आवाज से गूंजती थीं, वो अब मोल-तोल और ग्राहकों की रौनक से गुलजार हो गईं.

​आज भी जिंदा है वो ढाई सौ साल पुराना राज

​आज सन 2026 है। ढाई सदियां बीत जाने के बाद भी, जब आप बोडम बाजार की तंग गलियों में कदम रखते हैं, तो कैप्टन बोडम का वो राज आज भी अपनी मौजूदगी का अहसास कराता है. सदर अस्पताल रोड से लेकर झंडा चौक और बड़े बाजार की सीमाओं को समेटे यह इलाका आज भी हजारीबाग का सबसे बड़ा कमर्शियल हब है. ​इसकी विरासत की गवाही आज भारत सरकार की वो मुहर भी देती है, जिसके तहत डाक विभाग के रिकॉर्ड में इसे आज भी ‘बोडम बाजार सब-पोस्ट ऑफिस’ (पिन कोड: 825301) के नाम से ही पुकारा जाता है. लोग भले ही इसे बोलचाल में ‘बॉटम बाजार’ कह दें, लेकिन सरकारी दस्तावेज और इतिहास के पन्ने आज भी ‘बोडम’ के नाम की गवाही देते हैं. ​तो अगली बार जब आप बोडम बाजार की किसी सीधी गली से गुजरें या झंडा चौक की तरफ मुड़ें, तो एक पल के लिए रुककर सोचिएगा जरूर आप सिर्फ खरीदारी नहीं कर रहे, बल्कि आप सन 1790 के एक ब्रिटिश कैप्टन के उस रहस्यमयी और ऐतिहासिक मास्टरप्लान के अंदर चल रहे हैं, जो आज भी हजारीबाग के सीने में धड़क रहा है.

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