विनीत आभा उपाध्याय
Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर प्रतिवादी को अदालती कार्यवाही की जानकारी थी और उसके पास अदालत में उपस्थित होने का पर्याप्त अवसर था तो केवल समन तामील में अनियमितता के आरोपों के आधार पर एकतरफा डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता. यह आदेश झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने रांची सिविल कोर्ट से पारित एक आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए दिया.
क्या है विवाद
यह विवाद रांची के मौजा-दातमा में स्थित खाता संख्या 56, प्लॉट संख्या 64 के तहत आने वाली 10 डिसमिल जमीन से जुड़ा है. जिसमें मूल मुकदमा मोहम्मद सलीम खान द्वारा वर्ष 2023 में (मूल वाद संख्या 576/2023) 14 नवंबर 1945 के सेल डीड के आधार पर मालिकाना हक की घोषणा और कब्जे के लिए दायर किया गया था जिसे निचली अदालत ने एकतरफा डिक्री कर दिया था. अपीलकर्ताओं का दावा था कि उन्हें नोटिस का उचित तामील नहीं हुआ था और उन्हें इस डिक्री की जानकारी केवल निष्पादन कार्यवाही के दौरान मिली. उन्होंने यह भी दलील दी कि उनके पूर्वजों ने बाद में जमीन खरीदी थी और वहां प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान भी बने हुए हैं.
ट्रायल कोर्ट की जांच में क्या मिला
अदालत ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत दोनों ने सर्वसम्मति से पाया था कि अपीलकर्ताओं को मामले की पूरी जानकारी थी लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए. जिसके बाद कोर्ट ने कानूनी प्रावधानों को रेखांकित करते हुए कहा कि अगर प्रतिवादी को सुनवाई की तारीख की नोटिस थी और पर्याप्त समय था तो महज तकनीकी या मामूली अनियमितता के आधार पर डिक्री रद्द नहीं की जा सकती.अदालत ने कहा कि मुख्य परीक्षण यह होना चाहिए कि क्या प्रतिवादी वास्तव में अदालत में उपस्थित होना चाहता था और उसने इसके लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 100 सीपीसी के तहत द्वितीय अपील केवल कानून के सारभूत प्रश्न पर ही विचार कर सकती है न कि स्थापित तथ्यों की समीक्षा के लिए. हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखते हुए द्वितीय अपील को खारिज कर दिया. इस मामले में अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता आयुष आदित्य ने बहस की.



