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EXCLUSIVE: झारखंड में वामपंथी उग्रवाद पर बड़ा खुलासा: भाकपा माओवादी के शीर्ष कमांडरों के पांच दस्ते अभी भी सक्रिय, करोड़ों रुपये का बकाया मुख्य मुद्दा

SAURAV SINGH Ranchi : झारखंड में सक्रिय नक्सली संगठनों को लेकर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सामने आई है. इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य...

SAURAV SINGH

Ranchi : झारखंड में सक्रिय नक्सली संगठनों को लेकर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सामने आई है. इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य के अलग-अलग जिलों और सीमावर्ती इलाकों में भाकपा माओवादी समेत अन्य प्रतिबंधित संगठनों के दस्ते अभी भी सक्रिय हैं. इन्हें खत्म करने के लिए सुरक्षा बल बड़े पैमाने पर संयुक्त अभियान चला रहे हैं.

 कुल सक्रिय नक्सल दस्तों की संख्या और उनकी ताकत का पूरा ब्योरा 

  • राज्य में सबसे बड़ा खतरा भाकपा माओवादी बना हुआ है, जिसके कुल 36 दस्ते सक्रिय हैं.
  • झारखंड जन मुक्ति परिषद (JJMP) के चार दस्ते सक्रिय हैं.
  • तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) के तीन दस्तों की मौजूदगी दर्ज की गई है.

राज्य के संवेदनशील इलाकों में माओवादी कमांडरों की है सक्रियता

  • कोल्हान, सारंडा और पोराहाट (पश्चिम सिंहभूम): कोल्हान, सारंडा और पोराहाट (पश्चिम सिंहभूम): इस क्षेत्र में माओवादी संगठन के पोलित ब्यूरो मेंबर मिसिर बेसरा का दबदबा है. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार यहां उनके साथ लगभग 28 नक्सलियों का दस्ता सक्रिय है, जो सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है.
  •  पलामू-चतरा बॉर्डर: इस सीमावर्ती क्षेत्र में जोनल कमेटी मेंबर मनोहर और रीजनल कमेटी मेंबर नितेश का दस्ता सक्रिय है, जिसमें लगभग तीन नक्सली शामिल हैं.
  • लातेहार-गढ़वा बॉर्डर: इस रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में जोनल कमेटी मेंबर राजू का दस्ता सक्रिय है, जिसमें लगभग तीन सदस्य शामिल हैं.
  • लातेहार-लोहरदगा बॉर्डर: यहां रीजनल कमेटी मेंबर रवींद्र का दस्ता सक्रिय है, जिसमें लगभग एक सदस्य की मौजूदगी बताई गई है.

नक्सल मोर्चे पर सुरक्षा और बजट को लेकर बड़ी चिंताए

राज्य में उग्रवाद के खिलाफ जारी लड़ाई के बीच सुरक्षा, पुनर्वास और वित्तीय प्रबंधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उभरकर सामने आए हैं. प्रशासन इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार कर रहा है, ताकि उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति स्थापित की जा सके.

करोड़ों रुपये का वित्तीय बकाया

सुरक्षा से जुड़े खर्चों के तहत एसआरई (Security Related Expenditure) के अंतर्गत बड़ी राशि का भुगतान अभी बकाया है. वित्तीय वर्ष 2024-25 तक कुल 153 करोड़ रुपये और वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए 45 करोड़ रुपये की राशि बकाया बताई जा रही है. सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बचे हुए छोटे सक्रिय उग्रवादी समूहों को खत्म करना है. इसके लिए विभिन्न बलों के बीच समन्वय स्थापित कर संयुक्त अभियान चलाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है.

कोल्हान और सारंडा इलाके में सैनिटाइजेशन, आईईडी और स्पाइक होल्स का खतरा

कोल्हान और सारंडा जैसे घने जंगलों वाले क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ा खतरा जमीन में छिपे IED और स्पाइक होल हैं. इन इलाकों में ‘एरिया सैनिटाइजेशन’ अभियान चलाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य ऐसे खतरों को ढूंढकर नष्ट करना है. सुरक्षा बलों ने पारसनाथ, बूढ़ा पहाड़ और ट्राई-जंक्शन जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को नक्सल प्रभाव से मुक्त कर लिया है, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती इन इलाकों पर स्थायी पकड़ बनाए रखने की है, ताकि उग्रवादी दोबारा सक्रिय न हो सकें.

वहीं आत्मसमर्पण करने वाले नक्सल कैडरों के पुनर्वास की प्रक्रिया भी तेज करने की आवश्यकता बताई जा रही है, ताकि उन्हें मुख्यधारा से जोड़कर अन्य कैडरों को भी हिंसा छोड़ने के लिए प्रेरित किया जा सके.

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