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कांग्रेसः विष पी लेंगे, राजद और लेफ्ट का आरोप सह लेंगे, जितना चाहो उतनी बदनामी सह लेंगे, अपने उम्मीदवार को चुनाव में हरवा देंगे, लेकिन गठबंधन नहीं छोड़ेंगे

Akshay Kumar Jha Ranchi: समरथ के नहीं कोई दोष गोसाई. ये पंक्ति आप ने भी कई अवसरों पर सुना होगा. सरल शब्दों...

Akshay Kumar Jha

Ranchi:  समरथ के नहीं कोई दोष गोसाई. ये पंक्ति आप ने भी कई अवसरों पर सुना होगा. सरल शब्दों में इसका मतलब होता है जो मजबूत है उस पर कोई उंगली नहीं उठा सकता. राज्य सभा चुनाव के बाद बयानों और आरोप प्रत्यारोप के बाद जो स्थिति बनी है उससे तो यही बात प्रमाणित होती है. यह बातें यहां जेएमएम के लिए लिखी जा रही है. क्योंकि फिलहाल जो स्थिति है, उससे साफ है कि सूबे में जेएमएम से ज्यादा मजबूत कोई नहीं है. चाह कर भी जेएमएम की सहयोगी पार्टी उसे बुरा भला नहीं कह सकती है और ना ही किसी तरह का आरोप उसपर लगा सकती है. 

सत्ता में रहते हुए भी सबसे कमजोर है कांग्रेस

ऐसा शायद ही देखा जाता है कि कोई पार्टी सत्ता में हो और इतनी मजबूर हो. राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस में कितनी ताकत बची हुई है वो साफ हो गया. कांग्रेस के प्रभारी के राजू ने राजद और वाम दलों की तरफ से कांग्रेस प्रत्याशी को वोट नहीं दिए जाने के बयान के बाद राजद और वाम दलों ने पलट वार किया. इस बीच शनिवार 20 जून को  कांग्रेस के लगभग एक दर्जन विधायकों के साथ प्रदेश अध्यक्ष ने प्रेस कांफ्रेस कर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की. कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री राधा कृष्ण किशोर का कहना था कि भाजपा झारखंड में महागठबंधन सरकार में फूट डालने की कोशिश कर रही है. ये हास्यास्पद नहीं तो और क्या है? हद तो यह है कि कमजोर कांग्रेस के मजबूत मंत्री राधा कृष्ण किशोर कहते हैं कि हम विष पी लेंगे. लेकिन सरकार में ही रहेंगे. 

दीन-हीन अवस्था में कांग्रेस

कांग्रेस के बदलते रुख से अब तकलीफ नहीं होती बल्कि झारखंड कांग्रेस की दीन हीन अवस्था पर दया आती है. बताईये झारखंड में महागठबंधन के नेता हेमंत सोरेन हैं और कांग्रेस के उम्मीदवार की हार पर कांग्रेस मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे. जबकि राज्य सभा चुनाव में परिमल नाथवानी की जीत की असली पटकथा तो झामुमो और मुख्यमंत्री ने ही लिखी. ये मैं नहीं कह रहा बल्कि घटनाएं और परिस्थितियां  कह रही है. याद कीजिए मतदान से दो दिन पहले तक मुख्यमंत्री आवास में महागठबंधन के सभी विधायकों का मॉक पोल कराया गया. सभी मॉक पोल में झामुमो के उम्मीदवार बैद्यनाथ राम को 28 वोट आते रहे. मतदान के दिन अचानक 30 वोट यू ही नहीं मिले. 30 वोट देने के पीछे रणनीति ये थी कि यदि राजद के 4 और वाम दल के 2 वोट मिल भी जाए तो भी प्रणव झा को मिलने वाले वोटो की संख्या 26 ही पहुंचे. जो जीत के लिए जरूरी वोट से कम हो. प्रणव झा को 26 नहीं सिर्फ 20 मान्य वोट मिला और 1 अमान्य हुआ. मतलब  साफ है कि शुरुआती पटकथा लिखे जाने के बाद ही महागठबंधन के अन्य विधायकों ने उस पटकथा को अमली जामा पहनाया और नाथवानी के पक्ष में मतदान किया.

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कांग्रेस सब जानती थी, फिर भी

झामुमो के बैद्यनाथ राम को झामुमो विधायकों द्वारा 30 वोट दिये जाने के साथ ही कांग्रेस उम्मीदवार की हार का रास्ता साफ चुका था. ये सब  कांग्रेस को भी पता है. बावजूद इसके कांग्रेस की इतनी हिम्मत नहीं है कि वो इस सत्य को सार्वजनिक कर पाये. झारखंड में लगता है कांग्रेस हर हाल में झामुमो के सामने आत्मसर्पण का मन बना चुकी है. कांग्रेस अपने ऐसी करतूतों का परिणाम कई राज्यों में भुगत चुकी है. कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के सामने अपना वजूद खत्म कर चुकी है. झारखंड के सीमावर्ती राज्य उड़ीसा, बंगाल,  बिहार और उत्तर प्रदेश जहां कभी कांग्रेस का शासन हुआ करता था वहां अब कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के पीछे पीछे घूमने को मजबूर है. ओडीशा, बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश की तुलना में झारखंड में कांग्रेस मजबूत है. झारखंड में कांग्रेस जिस प्रकार से समर्पण की मुद्रा में आकर अपनी पहचान मिटाने पर आमादा है उससे लगता है झारखंड में भी कांग्रेस की स्थिति वही हो जाएगी जो ओडीशा, बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में है. 

अपने घोषणापत्र को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया

एक कहावत है सब कुछ लुटा कर होश में आए तो फिर क्या फायदा. यही कहावत झारखंड में कांग्रेस पर लागू होता दिख रहा है. पिछले  विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के घोषणा पत्र को ठंडे बस्ते में मुख्यमंत्री ने डाल दिया, कांग्रेस चुप. क्षेत्रीय भाषाओं के रूप में मैथिली, मगही और अंगिका को शामिल करने की कांग्रेस मंत्रियों की मांग भी सरकार ने नहीं मानी. राज्य सभा चुनाव में भी कांग्रेस को उसकी हैसियत बता दी गई.

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