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भूख के आगे हारी ममता : रांची में दो मासूमों की मां लाचार, बच्चों को अनाथालय भेजने की गुहार

Ranchi: कहते हैं कि एक मां अपने बच्चों के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकती है, लेकिन जब गरीबी, भूख और बेबसी...

Ranchi: कहते हैं कि एक मां अपने बच्चों के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकती है, लेकिन जब गरीबी, भूख और बेबसी की मार पड़ती है, तो मजबूत से मजबूत इरादे भी टूट जाते हैं. कुछ ऐसा ही दिल दहला देने वाला मामला राजधानी रांची के पिस्का नगड़ी इलाके से सामने आया है. यहां रहने वाली सीमा लोहरा आज जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही हैं. भूख का दर्द और अपनों को खोने का गम इस कदर हावी है कि एक मां अपने कलेजे के टुकड़ों को खुद से दूर करने पर मजबूर हो गई है.

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पति की हो चुकी है मौत

सीमा लोहरा की जिंदगी में दुखों का पहाड़ पिछले साल दिसंबर में टूटा, जब बीमारी के वजह से उनके पति का निधन हो गया और उनके पति का साया हमेशा के लिए सर से उठ गया. पति की मौत के बाद सीमा के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह न सिर्फ अकेली हुईं, बल्कि उन पर दो मासूम जिंदगियों की जिम्मेदारी भी आ गई. आज उनका एक तीन साल का बेटा है और दूसरा महज चार महीने का दूधमुंहा बच्चा है.

गोद में बच्चा और काम की तलाश, पर हर तरफ निराशा

पति के जाने के बाद घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा. दाने-दाने को मोहताज सीमा अपनी गोद में चार महीने के बच्चे को लेकर हर दिन काम की तलाश में घर से निकलती है. वह मजदूरी करने को भी तैयार है, लेकिन पीठ पर और गोद में छोटे बच्चों को देखकर कोई उन्हें काम पर रखने को राजी नहीं होता. दिन भर भटकने के बाद हर जगह से सिर्फ निराशा ही हाथ लगती है. स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि सीमा के घर में कई दिनों से चूल्हा तक नहीं जला है. खुद भूखे पेट रहकर चार महीने के बच्चे को दूध पिलाना एक मां के लिए असहनीय दर्द बन चुका है. भूख से तड़पते और रोते बच्चों को देखकर सीमा पूरी तरह टूट चुकी है. इसी बेबसी में भारी मन से उन्होंने कहा मुझसे मेरे बच्चों की भूख देखी नहीं जाती, कोई मेरे बच्चों को किसी अनाथालय में रखवा दीजिए. कम से कम वहां उन्हें समय पर खाना तो मिलेगा, उनका भविष्य तो बच जाएगा. मैं उन्हें भूख से मरते नहीं देख सकती.

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इंसानियत को पुकारती एक मां की आंखें

एक मां का अपने बच्चों को अनाथालय भेजने की बात कहना इस बात का सबूत है कि गरीबी ने उसकी ममता को किस कदर लाचार कर दिया है. सीमा को आज किसी सहानुभूति की नहीं, बल्कि तुरंत सीधे सहयोग की जरूरत है. राशन, बच्चों के लिए दूध, सिर छुपाने की सुरक्षित जगह और सम्मान से जीने के लिए एक रोजगार की दरकार है. प्रशासन और समाज के सक्षम लोगों से यह अपील है कि सीमा लोहरा की सुध लें. हमारा एक छोटा सा प्रयास, एक छोटी सी मदद दो मासूम बच्चों के चेहरे पर मुस्कान वापस ला सकती है और एक टूटती हुई मां की आंखों में जिंदगी जीने की उम्मीद जगा सकती है.

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