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माथे का मौर्य और हाथों की मेहंदी गवाह है, विदाई की डोली छोड़ परीक्षा देने निकला जोड़ा एक साथ बना अफसर

Ranchi: कहते हैं कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन कुछ जोड़ियां अपनी किस्मत की लकीरें खुद अपनी मेहनत और त्याग से...

Ranchi
विकास कुमार सिंह, कोमल कुमारी सिंह व उनकी माता

Ranchi: कहते हैं कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन कुछ जोड़ियां अपनी किस्मत की लकीरें खुद अपनी मेहनत और त्याग से लिखती हैं. अमूमन शादी के मंडप से जब कोई दुल्हन विदा होती है, तो सबकी आंखें नम होती हैं और शहनाइयों की गूंज के बीच वह एक नए जीवन में कदम रखती है. लेकिन झरिया के एक जोड़े ने लोक-लाज और सदियों पुरानी रस्मों से ऊपर उठकर अपने सपनों और कर्तव्य को चुना. आज जब बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) का अंतिम परिणाम आया, तो इस जोड़े के उसी त्याग ने पूरे इलाके को आंसुओं और मुस्कान का एक साथ ऐसा तोहफा दिया, जिसे लोग सदियों तक याद रखेंगे.

मंडप की खुशियों के बीच सपनों की परीक्षा

यह कहानी झरिया के चौथाई कुल्ही (भालगोड़ा) के रहने वाले विकास कुमार सिंह और बेगूसराय की कोमल कुमारी सिंह की है. 11 दिसंबर 2024 को दोनों परिणय सूत्र में बंधे थे. घर में शहनाइयां बज रही थीं, शादी की रस्में जारी थीं और ठीक दो दिन बाद यानी 13 दिसंबर को 70वीं बीपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा थी. एक तरफ जीवन का सबसे बड़ा व्यक्तिगत उत्सव था, तो दूसरी तरफ सालों की तपस्या. विकास और कोमल ने एक साहसिक फैसला लिया. उन्होंने अपनी विदाई के सबसे भावुक रस्म को बीच में ही रोक दिया. दूल्हा-दुल्हन के जोड़ों में, माथे पर मौर्य और हाथों में मेहंदी रचाए यह जोड़ा सिसकती और दुआएं देती आंखों के बीच विदाई की डोली में बैठने के बजाय सीधे परीक्षा केंद्र के लिए रवाना हो गया. उस वक्त शायद दुनिया को यह फैसला अजीब लगा हो, लेकिन आज वक्त ने साबित कर दिया कि उनका वह कदम इतिहास रचने के लिए उठा था.

पति बने अफसर, पत्नी संभालेंगी पुलिस की कमान

जब बीपीएससी का अंतिम परिणाम घोषित हुआ, तो इस परिवार के त्याग की कहानी कामयाबी के स्वर्णिम अक्षरों में बदल गई. दोनों ने न सिर्फ परीक्षा पास की, बल्कि शानदार रैंक हासिल कर समाज के सामने एक मिसाल पेश की. कोमल सिंह ने परीक्षा में 489वीं रैंक हासिल कर डीएसपी बनने का अपना सपना पूरा किया. उन्होंने इसके लिए अपनी सुरक्षित ‘राजस्व कर्मचारी’ की सरकारी नौकरी तक छोड़ दी थी. अपने दूसरे ही प्रयास में उन्होंने यह मुकाम हासिल किया. वहीं, विकास कुमार सिंह ने 1058वीं रैंक के साथ सफलता का परचम लहराया. विकास का चयन प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी (BPRO) के पद पर हुआ है.

दूध व्यवसायी पिता और मां के संस्कारों की जीत

विकास अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का पूरा श्रेय अपने परिवार, विशेषकर अपने बड़े भाई सूरज कुमार सिंह के मार्गदर्शन को देते हैं. विकास के पिता सुधीर कुमार सिंह एक साधारण दूध व्यवसायी हैं, जिन्होंने तंगहाली के बीच भी कभी बच्चों के हौसले टूटने नहीं दिए. मां इंदु देवी ने बच्चों को अनुशासन और शिक्षा की जो घुट्टी पिलाई थी, आज उसका असर पूरी दुनिया देख रही है. आज सुधीर बाबू के तीनों बेटे सरकारी सेवा में हैं. विकास का छोटा भाई राहुल कुमार सिंह पहले से ही रेलवे में स्टेशन मास्टर है, विकास खुद अब प्रशासनिक अधिकारी बन चुके हैं और घर की बहू अब सूबे में कानून-व्यवस्था संभालेगी. अगर इरादे फौलादी हों, तो परिस्थितियां कभी भी आपके सपनों की राह में रोड़ा नहीं बन सकतीं.

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