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30 साल पुराने हत्या मामले में उम्रकैद रद्द, HC ने कहा- संदेहास्पद गवाही के आधार पर नहीं हो सकती सजा

आयुष चौहान Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 30 वर्ष पुराने एक हत्या मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी मनसु मांझी उर्फ...

"A mother's love is paramount": High Court sets aside Family Court order, grants child's custody to the mother.

आयुष चौहान 

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब 30 वर्ष पुराने एक हत्या मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी मनसु मांझी उर्फ मानसा मांझी को बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि केवल संदेहास्पद और विरोधाभासी गवाही के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जा सकती. न्यायालय ने यह भी दोहराया कि यदि साक्ष्यों से दो संभावित निष्कर्ष निकलते हों तो आरोपी के पक्ष में जाने वाले दृष्टिकोण को स्वीकार किया जाना चाहिए.

1999 की दोषसिद्धि और उम्रकैद का आदेश निरस्त 

न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद एवं न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए बोकारो की प्रथम अतिरिक्त सत्र अदालत द्वारा वर्ष 1999 में सुनाई गई दोषसिद्धि और 2000 में दिए गए आजीवन कारावास के आदेश को रद्द कर दिया. 

क्या था 1996 का मामला?

मामला वर्ष 1996 का है. अभियोजन के अनुसार, आरोपी और एक अन्य व्यक्ति ने चंद्रमणि मांझियान की हत्या इसलिए कर दी थी क्योंकि वे उन्हें ‘डायन’ मानते थे. इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने मनसु मांझी को आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. 

प्रत्यक्षदर्शी की गवाही पर उठे सवाल 

हालांकि, अपील की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पूरे मामले का आधार मुख्य रूप से एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी बताए गए सूचक रूपलाल मांझी की गवाही थी, लेकिन उसकी गवाही में कई गंभीर विरोधाभास थे. अदालत ने पाया कि सूचक की पत्नी की गवाही उसके कथन से मेल नहीं खाती और घटना देखने संबंधी उसका दावा संदेह के घेरे में है. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सूचक ने कभी हमले में कुल्हाड़ी तो कभी तलवार के इस्तेमाल की बात कही, जिससे अभियोजन की कहानी कमजोर हो जाती है. इसके अलावा जांच अधिकारी (Investigating Officer) को अदालत में पेश नहीं किया गया, जिसके कारण घटनास्थल तक ठीक से साबित नहीं हो सका और इससे आरोपी को गंभीर पूर्वाग्रह हुआ. 

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‘संदेह का लाभ’ आरोपी को मिलना चाहिए 

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्धि तभी संभव है जब आरोप संदेह से परे साबित हों. यदि साक्ष्य विश्वसनीय न हों और आरोपी की संलिप्तता को लेकर उचित संदेह बना रहे, तो ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ आरोपी को दिया जाना चाहिए. 

आरोपी को किया गया बरी 

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ हत्या का आरोप संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है. इसलिए ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि एवं सजा संबंधी आदेश रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया गया. चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर था, उसे जमानत बंधपत्रों की जिम्मेदारी से भी मुक्त कर दिया गया.

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