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नए वीबी-ग्राम(G) कानून के खिलाफ फूटा मजदूरों का गुस्सा, आर-पार के मूड में मनरेगा मजदूर, 1 जुलाई को देशभर में होगा विरोध-प्रदर्शन

Ranchi : ग्रामीण रोजगार की जीवनरेखा कही जाने वाली मनरेगा पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है. केंद्र सरकार...

मनरेगा

Ranchi : ग्रामीण रोजगार की जीवनरेखा कही जाने वाली मनरेगा पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है. केंद्र सरकार द्वारा लाए जा रहे नए कानून वीबी-ग्राम (G) के विरोध में झारखंड सहित पूरे देश के ग्रामीण और मनरेगा मजदूर सड़क पर उतरने को मजबूर हो गए हैं. 1 जुलाई को झारखंड खेत एवं ग्रामीण मजदूर यूनियन के बैनर तले राज्य के तमाम पंचायत सचिवालयों और ग्रामीण स्तर पर एक विशाल और आक्रामक विरोध प्रदर्शन की घोषणा की गई है. मजदूरों और उनके संगठनों का साफ कहना है कि यह नया कानून मनरेगा को अपारदर्शी तरीके से दफन करने और गरीबों से काम का अधिकार छीनने की एक सोची-समझी क्रूर तकनीकी साजिश है.

हक पर हमला : तकनीकी नौकरशाही की तानाशाही

अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन के महासचिव बी. वेंकट ने इसे सामाजिक न्याय पर सीधा हमला करार दिया है. उन्होंने कहा कि मनरेगा मजदूरों में सबसे बड़ी आबादी महिलाओं की है. जिसमें लगभग 25 प्रतिशत दलित और आदिवासी हैं. सरकार का यह कदम सीधे तौर पर समाज के सबसे कमजोर तबके के पेट पर लात मारने जैसा है. 1 जुलाई से शुरू होने वाला यह आंदोलन तब तक नहीं थमेगा, जब तक सरकार इस काले कानून को वापस नहीं ले लेती.

डिजिटल हाजिरी का मकड़जाल और मजदूरों की मौत

मजदूरों के लिए सबसे बड़ा सर दर्द बनी है नई डिजिटल उपस्थिति, ई-केवाईसी और चेहरे की पहचान (फेस रिकग्निशन) प्रणाली. झारखंड की मनरेगा मजदूर और मेट पिंकी का कहना है कि यह सिस्टम बार-बार खराब होता है और इसका खामियाजा मजदूरों को भुगतना पड़ता है. जंगलों और सुदूर ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क गायब रहता है, जिससे ऑनलाइन हाजिरी नहीं हो पाती. हालिया अध्ययनों में सामने आया है कि केवल बाल कटवाने या कपड़े बदलने भर से यह तकनीक मजदूरों की पहचान करने से इनकार कर देती है. कई बार महिलाओं की आंखों की तस्वीरें ठीक से दर्ज नहीं हो पातीं. ऑनलाइन हाजिरी लगाने के चक्कर में मजदूरों को तीन-तीन घंटे भटकना पड़ता है, जियो-टैगिंग फेल हो जाती है और थक-हारकर मजदूर बिना काम किए लौट जाते हैं.

125 दिन का झांसा : कागज़ पर हकीकत का कत्ल

सरकार ढिंढोरा पीट रही है कि वीबी-ग्राम(G) के आने से रोजगार की गारंटी 100 दिनों से बढ़कर 125 दिन हो जाएगी. लेकिन सरकार के अपने आंकड़े और बजट इस सफेद झूठ की पोल खोल कर रख देते हैं. सच तो यह है कि वर्तमान में 100 दिनों का रोजगार बचाए रखने के लिए भी बजट में पर्याप्त पैसा नहीं है. प्रस्तावित आवंटन के अनुसार, अगर सक्रिय जॉब कार्ड धारकों को काम दिया जाए, तो राज्यों में मिलने वाले वास्तविक कार्य-दिवस बेहद शर्मनाक और डराने वाले हैं.

आंध्र प्रदेश : मात्र 42.35 दिन
• छत्तीसगढ़ : केवल 39.07 दिन
• उत्तर प्रदेश : सिर्फ 27.50 दिन
• मध्य प्रदेश : महज 25.66 दिन
• बिहार : सिर्फ 30.94 दिन
• कर्नाटक : केवल 26.44 दिन
• महाराष्ट्र : मात्र 14.40 दिन
• हरियाणा : सिर्फ 13.78 दिन

राज्यों पर वित्तीय बोझ और संघीय ढांचे को तोड़ने का खेल

झारखंड खेत एवं ग्रामीण मजदूर यूनियन के नेता वीरेन्द्र कुमार ने इस कानून को देश के संघीय ढांचे के खिलाफ बताया है. नए कानून के तहत केंद्र सरकार राज्यों के लिए एक निश्चित बजट तय कर रही है और यह शर्त रख रही है कि कार्यक्रम की लागत का 40 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को खुद वहन करना होगा. यह राज्यों की आर्थिक कमर तोड़ने की साजिश है. अगर राज्यों को अपने दम पर 125 दिनों का रोजगार सुनिश्चित करना पड़े, तो उन्हें भारी अतिरिक्त राशि की जरूरत होगी, जो इस प्रकार है:
• महाराष्ट्र : 31,013 करोड़ का अतिरिक्त बोझ
• उत्तर प्रदेश : 27,987 करोड़ की भारी-भरकम राशि
• तमिलनाडु : 27,212 करोड़ का वित्तीय भार
• राजस्थान : 22,549 करोड़ की जरूरत
मध्य प्रदेश : 20,037 करोड़ का भार
• कर्नाटक : 17,481 करोड़ का अतिरिक्त बोझ
• बिहार : 15,939 करोड़ की आवश्यकता
• आंध्र प्रदेश : 9,901 करोड़ का वित्तीय संकट

क्या है मांगें

• वीबी-ग्राम(G) कानून को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए और पुरानी, मजबूत मांग-आधारित मनरेगा व्यवस्था को पूरी तरह बहाल किया जाए.
• देशभर के तमाम मनरेगा मजदूरों के लिए वैधानिक न्यूनतम मजदूरी की गारंटी सुनिश्चित की जाए.

 

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