News Wave Desk: बिहार और पूर्वांचल में शादी-ब्याह का माहौल हो और पारंपरिक लोकगीतों की गूंज न सुनाई दे, ऐसा शायद ही कभी होता हो. आज भले ही भोजपुरी इंडस्ट्री में कई नए और मॉडर्न गाने लोकप्रिय हो गए हों, लेकिन कुछ लोकगीत ऐसे हैं जिनकी जगह आज भी कोई नहीं ले पाया है. इन्हीं में से एक है ‘सांवर सांवर सुरतिया तोहार दुल्हा’, जो पिछले करीब 35 वर्षों से हर शादी-विवाह का अहम हिस्सा बना हुआ है.
1989 में रिलीज हुआ, आज भी हर शादी में सबसे पहले गाया जाता है
साल 1989 में रिलीज हुआ यह पारंपरिक विवाह गीत आज भी बिहार और पूर्वांचल के घरों में शादी की रस्मों के दौरान ढोलक की थाप पर सबसे पहले गाया जाता है. पीढ़ियां बदल गईं, संगीत का अंदाज बदल गया, लेकिन इस गीत की लोकप्रियता आज भी बरकरार है. यही वजह है कि इसे हर विवाह समारोह की पहचान माना जाता है.
भगवान राम-सीता विवाह से जुड़ा है गीत का भाव
‘सांवर सांवर सुरतिया तोहार दुल्हा’ सिर्फ एक शादी का गीत नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का प्रतीक भी है. यह लोकगीत भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह प्रसंग से प्रेरित माना जाता है. गीत में दूल्हे की सांवली और मनमोहक छवि का बेहद सरल और भावपूर्ण शब्दों में वर्णन किया गया है, जो पूरे माहौल को भक्ति और उत्सव के रंग में रंग देता है.
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रील्स और सोशल मीडिया पर भी बना हुआ है ट्रेंड
समय के साथ इस गीत के कई नए, फ्यूजन और मॉडर्न वर्जन सामने आए, लेकिन शारदा सिन्हा की मूल आवाज में गाया गया संस्करण आज भी सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है. सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम रील्स के दौर में भी यह शादी से जुड़े वीडियो के लिए सबसे लोकप्रिय बैकग्राउंड ट्रैक में शामिल है.
कौन थीं शारदा सिन्हा?
पद्म भूषण से सम्मानित दिवंगत शारदा सिन्हा को बिहार की ‘स्वर कोकिला’ कहा जाता है. उन्होंने भोजपुरी, मैथिली और मगही लोक संगीत को देश-विदेश तक नई पहचान दिलाई. छठ महापर्व के गीतों से लेकर सोहर, गारी और समदाओ जैसे पारंपरिक विवाह गीतों तक, उनकी आवाज पूर्वांचल की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा बन चुकी है.
बॉलीवुड में भी छोड़ी अमिट पहचान
लोक संगीत के साथ-साथ शारदा सिन्हा ने हिंदी फिल्मों में भी अपनी खास पहचान बनाई. उन्होंने फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ का ‘काहे तोसे सजना’, ‘हम आपके हैं कौन’ का भावुक गीत ‘बाबुल’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का लोकप्रिय लोकगीत ‘तार बिजली से पतले हमारे बलमा’ गाकर दर्शकों का दिल जीता. 5 नवंबर 2024 को उनके निधन के साथ लोक संगीत के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत हुआ, लेकिन उनके गीत आज भी बिहार और पूर्वांचल की संस्कृति की अमूल्य धरोहर बने हुए हैं.
