Ranchi: झारखंड समेत देशभर की विभिन्न अदालतों में वर्षों से लंबित परीक्षा और भर्ती धांधली के मामलों के जल्द निपटारे के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई )ने एक बड़ा कदम उठाया है। सीबीआई द्वारा जांच पूरी किए जाने के बावजूद 158 मामले अदालतों में ट्रायल हैं, जिनमें से कुछ मामले दो दशक से अधिक पुराने हैं. अब सीबीआई इन सभी मामलों को नए कानून लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2026 के तहत गठित किए जाने वाले विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट में स्थानांतरित कराने के लिए देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों का रुख करेगी.

झारखंड में पांच मामले लंबित, देश के अन्य राज्यों में भी दर्जनों केस अटके:
– इस पहल का बड़ा प्रभाव झारखंड पर भी पड़ेगा, जहां परीक्षा धांधली से जुड़े पांच प्रमुख मामले सीबीआई की जांच पूरी होने के बाद भी ट्रायल के इंतजार में हैं. देशभर में लंबित मामलों का राज्यवार विवरण इस प्रकार है.
– झारखंड: पांच मामले लंबित
– दिल्ली: सबसे अधिक 25 मामले (जैसे 2010-11 एम्स पीजी भर्ती, 2011 दिल्ली यूनिवर्सिटी मेडिकल व डेंटल प्रवेश परीक्षा, 2004 कैट 2013 एसएससी भर्ती परीक्षा)
– तमिलनाडु: 14 मामले
– उत्तर प्रदेश: 10 मामले
– पश्चिम बंगाल: 10 मामले
– राजस्थान: आठ मामले
– बिहार: पांच मामले (नीट 2024 पेपर लीक के 3 मामले, 2003 व 2011 पी एमटी धांधली सहित)
– कर्नाटक: पांच मामले
– हिमाचल प्रदेश: तीन मामले (2022 पुलिस कांस्टेबल भर्ती सहित)
– जम्मू और कश्मीर: तीन मामले (जूनियर इंजीनियर व कांस्टेबल भर्ती)
– महाराष्ट्र: तीन मामले (नीट 2024 से जुड़े दो मामले)
देरी से साक्ष्यों और गवाहों के कमजोर होने का खतरा:
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, मुकदमों की सुनवाई में अत्यधिक देरी से आरोपियों के खिलाफ अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर पड़ने की संभावना बढ़ जाती है. समय बीतने के साथ गवाह बुजुर्ग हो जाते हैं या उपलब्ध नहीं रहते. गवाहों की याददाश्त धुंधली हो जाती है और उनके बयान बदलने की आशंका बनी रहती है. जांच अधिकारियों, सरकारी वकीलों और न्यायाधीशों के बार-बार होने वाले तबादलों से भी कार्यवाही जटिल हो जाती है, जिससे मुकदमों के ठप होने का जोखिम बढ़ जाता है.
2026 के नए कानून के तहत क्या बदलेगा?:
संसद द्वारा पारित लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2026 के तहत प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से एक सत्र न्यायालय को विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट के रूप में नामित करना अनिवार्य है.
नए कानून के प्रमुख प्रावधान:
– अदालतों को बिना किसी अनावश्यक स्थगन के दैनिक आधार पर सुनवाई करनी होगी.
– चार्जशीट दाखिल होने के 3 महीने के भीतर या किसी अन्य अदालत से स्थानांतरित मामलों को तीन महीने के भीतर निपटाना होगा.
– राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इन मामलों के लिए समर्पित विशेष सरकारी वकील नियुक्त किए जाएंगे.

– यदि आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) या किसी अन्य कानून के तहत भी जुड़े हुए आरोप हैं, तो फास्ट-ट्रैक कोर्ट अलग-अलग अदालतों में केस भेजने के बजाय सभी आरोपों का ट्रायल एक साथ ही करेगी.
