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जयपाल सिंह स्टेडियम में आचार्य अलोकेश्वर और मोहम्मद अहमद सैफी की जोड़ी, जंतर-मंतर से शुरू हुई दोस्ती अब रांची में आंदोलनरत छात्रों का बढ़ा रही हौसला

विनीत/सौरभ Ranchi: जब मकसद देश के युवाओं के भविष्य को संवारना हो, तो न तो धार्मिक पहनावे की दीवारें आड़े आती हैं...

विनीत/सौरभ

Ranchi: जब मकसद देश के युवाओं के भविष्य को संवारना हो, तो न तो धार्मिक पहनावे की दीवारें आड़े आती हैं और न ही राज्यों की भौगोलिक सीमाएं. इसकी एक जीवंत और प्रेरक मिसाल इन दिनों रांची के ऐतिहासिक जयपाल सिंह स्टेडियम में देखने को मिल रही है. यहां परीक्षाओं में सुधार और अपने हक की लड़ाई लड़ रहे छात्रों का मनोबल बढ़ाने दो ऐसे अनोखे मित्र पहुंचे हैं, जिनकी वेशभूषा भले ही अलग-अलग धर्मों का प्रतिनिधित्व करती हो, लेकिन उनका संकल्प और उद्देश्य एक ही है.

एक ओर भगवा वस्त्र धारण किए कर्नाटक से आए आचार्य अलोकेश्वर हैं, तो दूसरी ओर सिर पर टोपी पहने पुरानी दिल्ली के रहने वाले मोहम्मद अहमद सैफी. दोनों की वेशभूषा पहली नजर में दो अलग-अलग छोर की कहानी लगती है, लेकिन जयपाल सिंह स्टेडियम में छात्रों के बीच खड़े ये दोनों चेहरे भाईचारे और साझा लड़ाई का मजबूत प्रतीक बने हुए हैं.

जंतर-मंतर की तपिश में पकी दोस्ती

आचार्य अलोकेश्वर और मोहम्मद अहमद सैफी की यह अनूठी यात्रा दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुई थी. जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा के मुद्दे पर हुए देशव्यापी आंदोलन के दौरान दोनों की पहली मुलाकात हुई थी. देश और युवाओं के मुद्दों पर दोनों के विचार इतने मिले कि कुछ ही समय में यह जान-पहचान प्रगाढ़ दोस्ती में बदल गई.

तब से लेकर आज तक दोनों न सिर्फ साए की तरह साथ रहते हैं और साथ खाते हैं, बल्कि जहां कहीं भी युवाओं के हक की बात होती है, वहां एक साथ खड़े नजर आते हैं. दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह सफर अब झारखंड की राजधानी रांची तक आ पहुंचा है, ताकि यहां आंदोलनरत छात्रों को यह महसूस हो कि उनकी लड़ाई में पूरा देश उनके साथ है.

एक मंच पर एकजुटता की अपील

जयपाल सिंह स्टेडियम में छात्रों के समर्थन में पहुंचे दोनों मित्रों ने जब आंदोलन स्थल पर दो अलग-अलग मंच लगे देखे, तो उन्होंने अपनी मायूसी और चिंता व्यक्त की. जंतर-मंतर के सफल आंदोलन के अपने अनुभवों को साझा करते हुए दोनों ने आंदोलनकारियों को एकजुटता का पाठ पढ़ाया.

अहमद और अलोकेश्वर कहते हैं कि अगर दो अलग-अलग मंचों की जगह एक ही साझा मंच होता, तो छात्रों की आवाज में कहीं अधिक खनक और मजबूती होती. जंतर-मंतर पर मिली सफलता की सबसे बड़ी वजह यही थी कि वहां हर संगठन और हर विचारधारा के लोग अपने मतभेद भुलाकर एक ही मंच पर एकत्र हुए थे. सरकार को झुकना ही पड़ा, क्योंकि आवाज एक थी.

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बिखराव के बजाय एकजुटता पर जोर

दोनों का कहना है कि यहां भी बिखराव के बजाय एकजुटता की जरूरत है. उनका मानना है कि आंदोलन में मंचों का बंटवारा छात्रों की ऊर्जा को कमजोर करता है. अगर सभी संगठन अपने व्यक्तिगत और सांगठनिक मतभेदों को दरकिनार कर एक ही झंडे और एक ही मंच के नीचे आ जाएं, तो शासन-प्रशासन पर दबाव कहीं अधिक तेजी से और प्रभावी ढंग से बनाया जा सकता है.

गंगा-जमुनी तहजीब का संदेश

जयपाल सिंह स्टेडियम में आचार्य अलोकेश्वर और मोहम्मद अहमद सैफी का एक साथ बैठना, छात्रों को संबोधित करना और साथ में भोजन करना महज आंदोलन का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह देश की गंगा-जमुनी तहजीब का एक जीवंत संदेश भी है.

आंदोलन पर बैठे छात्रों का कहना है कि इन दोनों की मौजूदगी ने न केवल उनके भीतर एक नया जोश भरा है, बल्कि उन्हें यह सीख भी दी है कि बड़ी से बड़ी लड़ाई आपसी तालमेल, एकता और साझा मंच के दम पर ही जीती जा सकती है.

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