रांची से दिल्ली तक बायो-डाटा का लोड, 24 विधायकों वाली एनडीए को चाहिए 28, दांव पर होगी आदित्य साहू की प्रतिष्ठा, कांग्रेसियों को हाईकमान का सहारा

Ranchi: झारखंड की सियासी वादियों में इन दिनों मौसम का मिजाज बदले न बदले, लेकिन नेताओं के ब्लड प्रेशर का मीटर जरूर...

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू

Ranchi: झारखंड की सियासी वादियों में इन दिनों मौसम का मिजाज बदले न बदले, लेकिन नेताओं के ब्लड प्रेशर का मीटर जरूर ऊपर-नीचे हो रहा है. इसकी वजह है राज्यसभा की दो खाली हो रहीं सीटें. चुनाव आयोग ने तारीखों का ऐलान कर दिया है, यह चुनाव किसी सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया जैसा नहीं, बल्कि एक जादुई शो जैसा दिख रहा है, जहां हर दल अपने-अपने तरीके से विधायकों को ढूंढने की कला का प्रदर्शन कर रहा है.

24 में 28 का पहाड़ा और अंतरात्मा की आवाज

भाजपा ने पूरे हौसले के साथ मैदान में उम्मीदवार उतारने का एलान कर दिया है. लेकिन जब बात राज्यसभा की हो, तो हौसले से ज्यादा संख्या बल की जरूरत होती है.राज्यसभा की एक सीट पर सीधे फतह हासिल करने के लिए 28 विधायकों के प्रथम वरीयता वाले मतों का कोटा चाहिए. एनडीए के पास हैं 24. यानी जीत की दहलीज से पूरे 4 कदम दूर. राजनीति के आधुनिक गणित में 24 और 28 के बीच का यह जो 4 का फासला है, इसे ही कुछ लोग क्रॉस वोटिंग कहते हैं, तो कुछ इसे विधायकों की अंतरात्मा की अचानक जागी आवाज का नाम देते हैं. झामुमो ने तो बाकायदा चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर धनबल और भयादोहन की आशंका जता दी है.

एक थाल, दो दावेदार और दिल्ली का दरबार

उधर, सत्तारूढ़ महागठबंधन (झामुमो-कांग्रेस-राजद-वामदल) के पास कुल 56 विधायक हैं. यानी गणित के हिसाब से दोनों सीटें इनकी जेब में हैं.  झामुमो के पास अकेले 34 विधायक हैं. लेकिन झामुमो दोनों सीटों पर दावा कर सकती है. कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं. नतीजा, दिल्ली के दरबार में हाजिरी लगाने का दौर शुरू हो चुका है. रांची के बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से दिल्ली जाने वाली उड़ानों में इन दिनों बायो-डाटा का वजन काफी बढ़ गया है.

दिग्गजों की कतार और उम्मीदों का गुब्बारा

सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है.सुबोधकांत सहाय दिल्ली की राजनीति के पुराने खिलाड़ी, जो एक बार फिर झारखंड के रास्ते संसद के उच्च सदन का दीदार करना चाहते हैं. प्रदीप बलमुचू और  राजेश ठाकुर संगठन और वफादारी के सर्टिफिकेट को अपनी जेब में रखकर आलाकमान के इशारे का इंतजार कर रहे हैं. वहीं फुरकान अंसारी अपनी पुरानी वरिष्ठता का हवाला देकर अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का कार्ड खेल रहे हैं.लेकिन परीक्षा का सिलेबस और पासिंग मार्क्स दोनों हाईकमान के मूड पर निर्भर करते हैं.

किसका करेगा काम, किसका बढ़ेगा सिरदर्द

इस राज्यसभा चुनाव की पटकथा केवल दो सांसदों को दिल्ली भेजने तक सीमित नहीं है. इसके परिणाम झारखंड की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेंगे.यदि झामुमो ने अपनी जिद पर अड़े रहकर दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए, तो विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के आत्मसम्मान को ऐसा ठेस पहुंचेगा कि गठबंधन का फेविकोल पिघल भी सकता है. वहीं, अगर दोनों मिलकर एक-एक सीट बांट लेते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि भाईचारे में ही भलाई है.

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चमत्कार या सिर्फ खोखला दांव

अगर भाजपा 4 विधायकों का जुगाड़ करके अपनी सीट निकाल लेती है, तो यह मौजूदा हेमंत सोरेन सरकार के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से एक बड़ा झटका होगा. लेकिन अगर भाजपा का यह दांव फेल हो जाता है, तो विपक्ष के हौसले पस्त होंगे और आगामी चुनावों में अजेय भाजपा का नैरेटिव कमजोर पड़ेगा.

आदित्य साहू की प्रतिष्ठा दांव पर

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान राज्यसभा सांसद आदित्य साहू की प्रतिष्ठा दांव पर होगी. वे खुद 2022 में राज्यसभा गए थे और हाल ही में उन्हें प्रदेश संगठन की कमान सौंपकर भाजपा ने ओबीसी कार्ड खेला है. उनके नेतृत्व में यह पहला बड़ा अग्निपरीक्षा वाला चुनाव है. यदि आदित्य साहू के प्रदेश अध्यक्ष रहते भाजपा अपने सहयोगियों (आजसू, जदयू, लोजपा) को पूरी तरह एकजुट रखकर सत्तारूढ़ खेमे में सेंधमारी करने में सफल रहती है, तो केंद्रीय नेतृत्व की नजरों में उनका कद आसमान छूने लगेगा.

 अंदरूनी गुटबाजी का खतरा

 झारखंड भाजपा के भीतर गुटबाजी जगजाहिर है. यदि यह प्रयोग असफल रहता है और भाजपा उम्मीदवार करारी हार का सामना करता है, तो विरोधी गुट तुरंत सक्रिय हो जाएगा. दिल्ली दरबार में यह रिपोर्ट भेजी जाएगी कि जब संख्या बल नहीं था, तो फजीहत कराने की क्या जरूरत थी. इससे आदित्य साहू की राजनीतिक पटकथा में क्रेडिट कम और डेबिट ज्यादा दर्ज हो जाएगा.

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