Akshay Kumar Jha
Ranchi: 2014 में रघुवर दास ने संथाल और आदिवासी इलाकों में खूब पसीना बहाया. लगातार दौरे किए. लेकिन जब चुनाव का रिजल्ट आया तो सत्ता से तो गायब हुए ही, झारखंड की राजनीति में पकड़ भी ढीली पड़ गई. यहां तक कि पार्टी अब मजबूत विपक्ष की भूमिका में भी नहीं है. जबकि देश के दूसरे राज्यों में बीजेपी का प्रदर्शन उम्दा रहा है. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र और बंगाल की बात कर सकते हैं. इन राज्यों में विधानसभा चुनाव जीतने के अलावा सांसदों में भी पार्टी ने सेंध लगा दी. लेकिन यहां सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा जैसे दिग्गज चुनाव हार जाते हैं. उनकी पत्नी तक विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाती हैं. ऐसे में बीजेपी के आला पदाधिकारियों को एक नया रास्ता बनाने की जिम्मेदारी दी जाती है. ग्राउंड लेवल पर काम करने के लिए आरएसएस माइंडसेट जैसे लोगों को खोजा जाने लगा और शुरू कर दी गई एक अलग तरह की राजनीति. झारखंड में बंगाल जैसा घुसपैठिया मुद्दा फ्लॉप हो गया. ऐसे में आदिवासी-सरना-मिशनरी और हिंदू की राजनीति ही विकल्प बचा हुआ था, जो अब शुरू हो चुका है.

शिबू सोरेन के बाद बाबूलाल को माना जाता था ट्राइबल लीडर, लेकिन वो भी फ्लॉप
झारखंड बनने के बाद और उससे पहले शिबू सोरेन आदिवासियों के नेता माने जाते थे. झारखंड बनने के बाद जब पहली बार बीजेपी सत्ता पर काबिज हुई तो बाबूलाल मरांडी का कद बढ़ा. उन्हें राज्य में शिबू सोरेन के बाद दूसरे नंबर का आदिवासी नेता माना जाने लगा. अंदरूनी कलह की वजह से उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी. लेकिन उनकी वापसी 2019 के चुनाव से पहले हो गई. लेकिन वह भी पार्टी को रिजल्ट नहीं दिला सके. फिलहाल झारखंड की राजनीति में उन्हें फ्लॉप ही माना जा रहा है. पार्टी के ही कुछ लोगों का कहना है कि कार्यकर्ता उनसे संतुष्ट नहीं हैं. अंदरखाने विरोध भी जताया जाता है.
बाबूलाल के फ्लॉप होने के बाद शुरू हुई RSS की पैरेलल पॉलिटिक्स
लगातार चुनाव में हार मिलने के बाद अब राजनीतिक संकट से उबरने के लिए आरएसएस की तरफ से राजनीति शुरू की गई. ऐसी राजनीति, जिसमें वह कहीं दिखे नहीं. उदाहरण के लिए वनवासी कल्याण केंद्र, ट्राइबल सोसाइटी, एकल विद्यालय जैसी संस्थाओं को तैयार किया जाने लगा. संथाल और तमाम इलाकों में एक अलग तरह की राजनीति शुरू हुई. संथाल पर गौर करें तो राजकिशोर हांसदा की गतिविधि पर नजर डाली जा सकती है. वह एक बुद्धिजीवी हैं. रांची के आसपास के इलाकों में आईआरएस और पूर्व मंत्री रामेश्वर उरांव की बेटी निशा उरांव की गतिविधि पर गौर करने वाली बात है.
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अगली किस्त में पढ़ें: इस बार आदिवासी के मिडिल क्लास पर है बीजेपी का फोकस, पढ़े-लिखे लोगों को जोड़ा जा रहा है.


