Click Here
Click Here
Click Here

BJP Come Back: झारखंड में हेमंत की राजनीति के आगे बीजेपी पस्त, वापसी के लिए हो रही है आरएसएस की एंट्री, खेला जा रहा आदिवासी-हिंदू का कार्ड, बंगाल के बाद झारखंड साधने की कोशिश (1)

Akshay Kumar Jha Ranchi: 2014 से पहले, झारखंड बनने के बाद कभी भी कोई पार्टी बहुमत में नहीं आ सकी. हमेशा से...

Akshay Kumar Jha

Ranchi: 2014 से पहले, झारखंड बनने के बाद कभी भी कोई पार्टी बहुमत में नहीं आ सकी. हमेशा से राजनीति में उठा-पटक सूबे में देखने को मिली. 2014 में बीजेपी ने पहली बार सत्ता पूरे बहुमत के साथ हासिल की. लेकिन 2019 में हेमंत सोरेन की अगुआई में झारखंड में सत्ता परिवर्तन हुआ. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पांच साल तक बिना किसी अड़चन के अपनी पकड़ सूबे में बनाए रखी. 2024 के चुनाव से पहले उन्हें जेल तक जाना पड़ा. लेकिन जेल से निकलने के बाद फिर से एक बार हेमंत ने साबित किया कि वह राजनीति के असली धुरंधर हैं. 2024 के चुनाव में बीजेपी फिर से एक बार पीछे ढकेल दी गई, वह भी बुरी तरह से.

झारखंड में आदिवासी मुद्दे पर राजनीति होना कोई अचरज की बात नहीं है. बीजेपी के आदिवासी चेहरे, मसलन- बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, चंपाई सोरेन, मधु कोड़ा, सीता सोरेन जैसे तमाम चेहरों को हेमंत ने औंधे मुंह पटखनी दी. पिछले विधानसभा चुनाव में हिंदुत्व की राजनीति के फायरब्रांड नेता हिमंता बिस्वा सरमा की रणनीति भी काम नहीं आई. इसलिए अब वापसी के लिए बीजेपी की तरफ से आदिवासी और हिंदू का कार्ड खेला जाना एक रणनीति बन गई है. आरएसएस की चुपके से एंट्री इस बात पर मुहर लगाती है.

रघुवर दास की गलती का खामियाजा भुगत रही BJP

2014 में झारखंड की जनता ने बीजेपी को पूर्ण बहुमत देकर सत्ता पर बिठाया. ओबीसी समुदाय से आने वाले रघुवर दास को कमान दी गई. मोदी मैजिक का फायदा निश्चित तौर पर बीजेपी को 2014 में मिला. लेकिन मोदी मैजिक के साथ रघुवर दास का मैजिक भी 2019 में वैनिश हो गया. इसके पीछे का मूल कारण सीएनटी और एसपीटी एक्ट में छेड़छाड़ को माना जाता है.

Raghubar Das
Raghubar Das

इस छेड़छाड़ को आदिवासी वोट बैंक के लोगों ने अपने स्वाभिमान से जोड़कर देखा. नतीजा साफ था. बीजेपी की तरफ से कई प्रमुख आदिवासी नेताओं को हार का सामना करना पड़ा. उदाहरण के लिए भिखारी भगत, चंद्रेश्वर उरांव, समीर उरांव, दिनेश उरांव, शिवशंकर उरांव, लुईस मरांडी और विमला प्रधान जैसे सरीखे नेताओं को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. साथ ही उनका राजनीतिक जीवन लगभग समाप्त माना जाने लगा.

जिस बीजेपी को 20 फीसदी तक आदिवासी वोट मिलते थे, उसे अब 10 फीसदी भी नहीं मिल पा रहे हैं. ऐसे में पार्टी के पास बेअसर आदिवासी नेताओं के अलावा दूसरे विकल्पों पर काम करना पड़ रहा है. इसलिए हो रही है आरएसएस की चुपके-चुपके एंट्री.

जारी…

आगली किस्त में पढ़ें कैसे हो रहा है आदिवासी-मिशनरी-हिंदू और सरना पर राजनीति…

Also Read: EXCLUSIVE: झारखंड में ड्रग्स माफियाओं पर शिकंजा, पिट-NDPS एक्ट के तहत 3 सालों में आए 50 प्रस्ताव, देवघर और चतरा में सबसे अधिक मामले, पढ़े पूरी रिपोर्ट

add1
सम्बंधित ख़बरें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *