रांची: लातेहार जिले के बालूमाथ अंचल से जुड़े पंजी-2 विवाद के मामले में गोविंदपुर अंचल के सर्किल इंस्पेक्टर (सीआई) कुमार सत्यम भारद्वाज को राज्य सरकार ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी है. विभागीय जांच में रिकॉर्ड में गड़बड़ी और कर्तव्य में अनियमितता के आरोप सही पाए जाने के बाद यह कार्रवाई की गई है. हालांकि कुमार सत्यम भारद्वाज इन आरोपों को पूरी तरह गलत बताते हुए दावा कर रहे हैं कि विभागीय जांच में उनके द्वारा दिए गए ऑडियो-वीडियो साक्ष्यों और तथ्यों को नजरअंदाज कर उन्हें साजिश के तहत दोषी ठहराया गया है.

Also Read : विद्यालय की लापरवाही से 8वीं के कई छात्र परीक्षा से वंचित, एडमिट कार्ड नहीं आने से नहीं दे पाए परीक्षा
क्या है मामला
यह मामला वर्ष 2021 में शुरू हुआ था, जब लातेहार जिले के बालूमाथ अंचल के बालू मौजा की रैयती जमीन के रिकॉर्ड को लेकर विवाद सामने आया था. मई 2021 में बालेश्वर महतो ने आवेदन देकर सीएस पंजी-2 की जगह आरएस पंजी-2 स्थापित करने का अनुरोध किया था. इस आवेदन के बाद मामले की जांच प्रक्रिया शुरू हुई. जांच के दौरान राजस्व उप निरीक्षक की ओर से भेजे गए प्रतिवेदन में एक आपत्ति दर्ज की गई थी. यह आपत्ति रैयत बढ़न महतो के पोतों की ओर से दर्ज कराई गई थी, जिनका कहना था कि उनकी रैयती जमीन को गलत तरीके से दूसरे व्यक्ति के नाम दर्ज करने की कोशिश की जा रही है.
कुमार सत्यम भारद्वाज के मुताबिक उस समय वे इस मामले की जांच से जुड़े हुए थे. उन्होंने बताया कि जांच के लिए उन्होंने राजस्व उप निरीक्षक मनोज बेक से संबंधित पंजी-2 की मांग की थी. उनके अनुसार 19 मई 2021 को दोपहर बाद उन्हें पंजी-2 उपलब्ध कराया गया था, जिसकी उन्होंने विधिवत रिसीविंग भी दी थी. इसके बाद 20 मई 2021 को कार्यालय में ही राजस्व उप निरीक्षक मनोज बेक और अनुसेवक जगन्नाथ प्रसाद गुप्ता की उपस्थिति में पंजी-2 की जांच की गई थी. उनका कहना है कि जांच के दौरान पंजी-2 को कार्यालय से बाहर नहीं ले जाया गया और न ही उसमें किसी तरह की छेड़छाड़ की गई.
हालांकि बाद में आरोप लगाया गया कि पंजी-2 को जबरन लेकर देखा गया और उसमें छेड़छाड़ की गई. इसी आधार पर उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई. जांच में तीन मुख्य आरोप लगाए गए. पहला आरोप यह था कि राजस्व उप निरीक्षक से पंजी-2 जबरन लेकर देखा गया और सामने जांच नहीं की गई. दूसरा आरोप यह लगाया गया कि यह कृत्य स्वेच्छाचारिता और पद के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है. तीसरा आरोप निर्गत पत्रों की पंजी में कथित छेड़छाड़ से संबंधित था. विभागीय जांच में इन आरोपों को सही मानते हुए सरकार ने कुमार सत्यम भारद्वाज को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आदेश जारी कर दिया.
Also Read : IAS विनय चौबे की जमानत याचिका पर SC से सरकार को नोटिस

क्या है सीआई का पक्ष
कुमार सत्यम भारद्वाज इन सभी आरोपों को गलत बताते हुए कहते हैं कि उन्होंने पूरे मामले में विभाग को विस्तृत स्पष्टीकरण दिया था. उनका कहना है कि पंजी-2 की जांच कार्यालय में ही संबंधित कर्मचारियों की मौजूदगी में की गई थी और उसमें किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं हुई थी. उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि किन परिस्थितियों में राजस्व उप निरीक्षक मनोज बेक यह कह रहे हैं कि वे पंजी-2 देखते समय मौजूद नहीं थे. श्री भारद्वाज का कहना है कि श्री बेक ने ही उन्हें पंजी-2 रिसीव कराया था और 27 मई 2021 को उसे वापस भी रिसीव कर लिया था, ऐसे में स्वेच्छाचारिता का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि यह पूरी तरह सरकारी प्रक्रिया के तहत हुआ था.
तीसरे आरोप को लेकर उनका कहना है कि निर्गत पत्रों की पंजी के कस्टोडियन कार्यालय के सहायक होते हैं. उन्होंने स्पष्ट कहा था कि संबंधित प्रविष्टि उनकी लिखावट में है और अंचल कार्यालय के निर्देश पर दर्ज की गई थी. इसके बावजूद उन्हें विभागीय जांच में गवाह के रूप में शामिल नहीं किया गया. कुमार सत्यम भारद्वाज का दावा है कि उन्होंने विभाग को कई महत्वपूर्ण साक्ष्य भी उपलब्ध कराए थे. इनमें तत्कालीन अंचल अधिकारी आफताब आलम और राजस्व उप निरीक्षक मनोज बेक के साथ हुई बातचीत के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग भी शामिल थीं. उन्होंने इन रिकॉर्डिंग के ट्रांसक्रिप्ट के साथ 17 नवंबर 2025 को विभाग को अंतिम कारणपृच्छा का जवाब भी सौंपा था.
उनका आरोप है कि विभाग ने इन साक्ष्यों की समुचित समीक्षा नहीं की और उन्हें नजरअंदाज कर दिया. वे यह भी कहते हैं कि जिस जमीन को लेकर पूरा विवाद हुआ, वह पूरी तरह रैयती जमीन है. न तो यह सरकारी भूमि है और न ही सार्वजनिक भूमि है. उनके अनुसार किसी भी रैयत ने कभी कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी, इसके बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई की गई.
कुमार सत्यम भारद्वाज का कहना है कि उन्हें इस आदेश के खिलाफ न्यायालय जाने की स्वतंत्रता दी गई है और उन्होंने अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को चुनौती देते हुए अदालत में याचिका भी दायर कर दी है. अब यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है, जहां दोनों पक्षों के तर्क और साक्ष्यों के आधार पर आगे की स्थिति तय होगी.
उन्होंने यह भी कहा कि प्रोन्नति के मामले में वे विभागीय दबाव में नहीं आए, जिसके बाद उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है. उनका कहना है कि विभाग ने यह भी लिखा है कि वे बार-बार पुराने साक्ष्य ही प्रस्तुत करते हैं और नए साक्ष्य नहीं देते हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या साक्ष्य भी बदलते हैं.
दूसरे आदेश में विभाग की ओर से यह भी लिखा गया है कि उनके कृत्य से रैयतों को हानि हुई है और भविष्य में भी हो सकती है. इस पर श्री भारद्वाज का कहना है कि विभाग एक भी ऐसे रैयत का नाम बताए जो उनके कारण प्रभावित हुआ हो. उन्होंने बताया कि संबंधित जमीन हल्का V के बालू मौजा की है, जिसका सीएस पंजी-2 और खातियान धरम महतो के नाम दर्ज है. नया आरएस पंजी-2 और खतियान बढ़न महतो के नाम बना हुआ है. इसी जमीन को बालेश्वर महतो अपने परिवार के नाम abandoned यानी नावल्दी या छोड़ी हुई जमीन के आधार पर पंजी-2 कराने का प्रयास कर रहे थे.
श्री भारद्वाज का कहना है कि उन्होंने अपनी जांच में स्पष्ट लिखा था कि यदि भूमि abandoned है तो बढ़न महतो तीसरा पक्ष हो जाते हैं और मामला व्यवहार न्यायालय का बनता है. वहीं यदि बढ़न महतो धरम महतो के उत्तराधिकारी हैं तो भूमि को abandoned कैसे माना जा सकता है. उनके अनुसार दोनों ही परिस्थितियों में यह मामला व्यवहार न्यायालय का बनता था. उन्होंने सवाल उठाया कि इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को उच्चाधिकारियों द्वारा नजरअंदाज क्यों किया गया.

