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मांदर की थाप से ग्लोबल मंच तक, झारखंड आदिवासी महोत्सव ने दी आधुनिकता और परंपरा के संगम की अनूठी मिसाल

Ranchi: आधुनिक होती दुनिया और अंधाधुंध शहरीकरण के इस दौर में अपनी जड़ों को थामे रखना कितना जरूरी है, इसकी एक जीवंत...

From the beats of the drum to the global stage, the Jharkhand Tribal Festival presented a unique example of the confluence of modernity and tradition.

Ranchi: आधुनिक होती दुनिया और अंधाधुंध शहरीकरण के इस दौर में अपनी जड़ों को थामे रखना कितना जरूरी है, इसकी एक जीवंत तस्वीर झारखंड की राजधानी रांची में देखने को मिली. दो दिनों तक चली सांस्कृतिक इंद्रधनुषी छटा के साथ झारखंड आदिवासी महोत्सव सोमवार को संपन्न हो गया. यह महोत्सव सिर्फ लोक संस्कृति और पारंपरिक व्यंजनों का एक उत्सव भर नहीं था, बल्कि यह आधुनिकता और विरासत के बीच एक ऐसा मजबूत सेतु साबित हुआ, जिसने देश-दुनिया को यह बता दिया कि परंपरा और तकनीक साथ-साथ कैसे चल सकते हैं.

अपने पीछे छोड़ गया कई दूरगामी संदेश

समापन के साथ ही यह महोत्सव अपने पीछे कई गहरे और दूरगामी संदेश छोड़ गया है. यह आयोजन इस बात का प्रतीक है कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा करने वाली आदिवासी संस्कृति केवल एक समुदाय की पहचान नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने का सबसे बड़ा संदेश है. रांची में दो दिनों तक गूंजी मांदर की यह थाप और आदिवासी जीवन-दर्शन का यह उत्सव आने वाले लंबे समय तक समाज को जोड़2 रखने और अपनी माटी से जुड़े रहने का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा.

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मांदर की थाप और AI का अनूठा संगम

महोत्सव के दौरान रांची का मोरहाबादी मैदान एक ऐसी दुनिया में तब्दील हो गया था, जहां इतिहास वर्तमान से हाथ मिला रहा था. एक तरफ पारंपरिक ढोल, नगाड़े और मांदर की थाप पर थिरकते कदम थे, तो दूसरी तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चैटबॉट के जरिए आदिवासी संस्कृति का डिजिटल प्रदर्शन आगंतुकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बना हुआ था. एआई तकनीक के माध्यम से आदिवासी परिधानों और हरियाली से जुड़े स्वरूपों को जिस आधुनिकता के साथ प्रस्तुत किया गया, उसने युवाओं को तकनीक और विरासत के नए समीकरण से जोड़ा. बोलना ही संगीत और चलना ही नृत्य की मूल भावना को समेटे हुए इन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि झारखंड की जनजातीय संस्कृति सिर्फ कागजों या किताबों में दर्ज नहीं, बल्कि सांस लेती हुई एक जीवंत परंपरा है.

अमर शहीदों और दिग्गजों को नमन

किसी भी समाज का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपने इतिहास और नायकों को कितना याद रखता है. इस महोत्सव ने नई पीढ़ी को अपनी गौरवशाली विरासत से जोड़ने का एक अदभुत कार्य किया. महोत्सव परिसर में दिशोम गुरु शिबू सोरेन और अमर शहीदों के कटआउट्स के साथ-साथ भगवान बिरसा मुंडा की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई थी. धरती आबा बिरसा मुंडा की प्रतिमा के माध्यम से उनके प्रारंभिक जीवन, जनजागरण, उलगुलान (आंदोलन), और उनके अदम्य संघर्ष की गाथा को इस खूबी से दर्शाया गया कि हर दर्शक का सिर गर्व से झुक गया. यह इस बात का संदेश था कि झारखंड का कण-कण बलिदान और स्वाभिमान की कहानी कहता है.

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ग्लोबल पहचान बनती जीआई टैग कला और लजीज व्यंजन

झारखंड की कला और शिल्प अब सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक पटल पर अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं. महोत्सव की थीमैटिक प्रदर्शनी ने इसे पूरी शिद्दत के साथ साबित किया. सोहराय चित्रकला, जादोपटिया, कोहबर कला के साथ-साथ बांस शिल्प, मुंडा आभूषण और डोकरा कला की प्रदर्शनियों ने स्थानीय कारीगरों की प्रतिभा का लोहा मनवाया. जनजातीय फूड स्टॉल्स, ‘सिप एंड चिल’ ज़ोन और पारंपरिक व्यंजनों ने लोगों का दिल जीत लिया. धुसका, गुलगुला, मड़ुआ लड्डू, छिलका रोटी और डुम्बू जैसे पारंपरिक व्यंजनों के जरिए खान-पान की हमारी समृद्ध विरासत की पुरानी यादें ताजा हो गईं.

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