Gumla: राज्य की हेमंत सरकार का दावा है कि उनके शासनकाल में शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर काफी गंभीरता से काम किया जा रहा है. पूर्ववर्ती सरकारों ने जितना शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर आदिंवासी बहुल इलाकों में काम नहीं किया उससे ज्यादा गंभीरता से काम यह सरकार कर रही है. लेकिन जमीनी हकीकत अगर आपको देखनी है तो एक बार गुमला जिला के स्वास्थ्य व्यवस्था को देख लीजिए. लगभग 10 लाख से अधिक की आबादी वाले गुमला जिले के लिए सरकार ने 151 डॉक्टर निर्धारित की है. लेकिन वर्तमान में महज 50 डॉक्टरों के बलबूते पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था का संचालन किया जा रहा है. इसमें सदर अस्पताल के साथ-साथ 11 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और रेफरल अस्पताल का संचालन शामिल है. इसे देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि गुमला जिला की स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी है.
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सरकार के दावे और जमीनी हकीकत में भारी अंतर
गुमला जिला में पहले से ही डॉक्टरों की भारी कमी रही है. बता दें कि जिला में कुल 66 डॉक्टर पोस्टेड हैं. इसमें 10 डॉक्टर हायर स्टडी या फिर अब्सेंट हैं. इसके कारण कुल 56 डॉक्टर स्वास्थ्य व्यवस्था संभाल रहे थे. इनमें से भी 6 डॉक्टरों का ट्रांसफर कर दिया गया. वर्तमान में 50 डॉक्टर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. सूबे के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी हमेशा यह दावा करते हैं कि आदिवासियों के साथ होने वाली स्वास्थ्य संबंधी घटनाएं उन्हें काफी चोट पहुंचती है. गुमला जिला में आए दिन होने वाली घटनाओं को लेकर लोग चिंता तो व्यक्त करते हैं लेकिन कोई सुधार होता हुआ नहीं दिखता. जहां डॉक्टर ही नहीं होंगे वहां स्वास्थ्य व्यवस्था कैसे बेहतर हो पाएगा. जब डॉक्टरों की कमी थी तो गुमला जिला से 6 चिकित्सकों का ट्रांसफर क्यों किया गया. आलम ये है कि स्वास्थ्य सुविधाओं और डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों की आए दिन मौत हो जाती है. गुमला सदर अस्पताल में 100 बेड के स्थान पर 235 बेड लगाकर मरीज का इलाज किया जा रहा है. मरीजों को भी जानवर की तरह रखने के लिए अस्पताल प्रबंधन मजबूर हो गया है. वहीं डॉक्टरों की कमी की समस्या के कारण उनका सही इलाज भी नहीं हो पाता. भगवान भरोसे ही सिस्टम चल रहा है. सिविल सर्जन डॉक्टर शंभू नाथ चौधरी का भी मानना है कि चिकित्सकों की कमी के कारण उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. कई बार वो खुद मरीजों का इलाज करते हुए नजर आते हैं.
