Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश रोंगोन मुखोपाध्याय और न्यायाधीश अरुण कुमार राय की खंडपीठ में राज्य सरकार से पूछा है कि क्या अब प्रशासनिक आदेश न्यायिक आदेश से ऊपर है? दरअसल खंडपीठ गोपाल प्रसाद के द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह पाया गया कि अदालत ने 9 दिसंबर 2022 को एक आदेश पारित किया था, जहां आदेश के अनुपालन की जगह आदेश के विपरीत कार्रवाई की गई.
विद्यालय का निर्माण लॉ एंड ऑर्डर का हवाला देते हुए रोका गया
मामला चान्हो प्रखंड के शिलागांई ग्राम में एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय बनाने का है. केंद्र सरकार ने इसके लिए राज्य सरकार को पैसे उपलब्ध कराए, जहां पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने विद्यालय के निर्माण का शिलान्यास भी कर दिया गया, लेकिन आदिवासी नेता देव कुमार धान समेत कई लोगों ने इसका जमकर विरोध किया और विद्यालय के लिए की गई बाउंड्री वॉल को तोड़ दिया. हालांकि मामले में प्राथमिकी दर्ज हुई की सरकारी काम में बाधा डाली गई और इस मामले को लेकर कुछ लोगों को जेल भी भेजा गया लेकिन राज्य सरकार ने विद्यालय का निर्माण लॉ एंड ऑर्डर का हवाला देते हुए रोक दिया.
राज्य सरकार ने विद्यालय निर्माण शिलागांई से सिर्फ 15 किलोमीटर दूर करने का प्रस्ताव दिया
वहीं राज्य सरकार ने विद्यालय का निर्माण शिलागांई से सिर्फ 15 किलोमीटर दूर करने का प्रस्ताव दिया, जिसका ग्रामीणों ने विरोध किया और कहा कि एक लंबे समय से ग्रामीण विद्यालय की मांग कर रहे थे. स्वतंत्रता सेनानियों एवं अन्य लोगों की अथक प्रयास से यह विद्यालय उन्हें मिला है. विद्यालय का निर्माण शिलागांई ग्राम में ही होना चाहिए था, हालांकि अदालत के आदेश एवं ग्रामीणों के विरोध के बावजूद विद्यालय का निर्माण शिलागांई ग्राम से 15 किलोमीटर दूर कर दिया गया और अदालत को इसकी जानकारी दी गई. इस पर अदालत में राज्य सरकार को जमकर लताड़ा और पूछा कि क्या न्यायिक आदेश से भी ऊपर प्रशासनिक आदेश हो गया है, राज्य सरकार की दलील थी कि लॉ एंड ऑर्डर की वजह से ऐसा किया गया. इस पर अदालत ने कहा कि लॉ एंड ऑर्डर को ही सरकार कहते हैं या कहें लॉ एंड ऑर्डर के लिए ही सरकार बनती है.
