HC ने पलटा निचली अदालत का फैसला- 14 साल जेल काटने के बाद डबल मर्डर में उम्रकैद की सजा पाए 4 को किया बरी

विनीत आभा उपाध्याय Ranchi: झारखण्ड हाईकोर्ट ने डायन -बिसाही के शक में दंपत्ति की निर्मम हत्या से जुड़े केस में दोषी करार...

"A mother's love is paramount": High Court sets aside Family Court order, grants child's custody to the mother.

विनीत आभा उपाध्याय 

Ranchi: झारखण्ड हाईकोर्ट ने डायन -बिसाही के शक में दंपत्ति की निर्मम हत्या से जुड़े केस में दोषी करार दिए गए 4 लोगों को बड़ी राहत दी है. झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने दोषी करार दिए गए लोगों की अपील पर विस्तृत सुनवाई के बाद साक्ष्यों की कमी देखते हुए निचली अदालत से दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है. हाईकोर्ट ने इन सभी आरोपियों को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया है. हाईकोर्ट ने जिन दोषी करार दिए गए लोगों को बरी किया है उसमें मोहन बोदरा, गार्दी जामुदा, कानूराम बोदरा और बाल कृष्ण बोदरा का नाम शामिल है.सभी अपीलकर्ता पश्चिम सिंहभूम जिले के तोकलो थाना क्षेत्र के हरजोरा गांव के रहने वाले हैं.

2011 में हुई थी दंपत्ति की हत्या

प्राथमिकी के मुताबिक डबल मर्डर की यह घटना 23 अगस्त 2011 की रात करीब 7:30 से 8:00 बजे की है. सूचक सोमा महली (मृतक का भाई) ने पुलिस को दिए फर्दबयान में आरोप लगाया था कि गांव के ही कुछ लोग उसके छोटे भाई बुधराम महली और उसकी पत्नी कुंती महली को ओझा-गुनी (डायन) होने के शक में घर से घसीटते हुए बाहर ले गए. वहां एक पेड़ के नीचे लाठी-डंडों से उनकी बेरहमी से पिटाई की गई.

बचाने गए भाई पर भी हुआ हमला 

जब सूचक ने अपने भाई-भाभी को बचाने का प्रयास किया तो आरोपियों ने उसके सिर पर भी लाठी से वार कर दिया जिससे वह घायल होकर गिर पड़ा. इसके बाद मोहन बोदरा, गार्दी जामुदा, कानूराम बोदरा और बाल कृष्ण बोदरा दंपत्ति के हाथ रस्सी से बांधकर उन्हें  लोदो पहाड़ के जंगल की ओर ले गए. 

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जंगल से मिले थे सड़े-गले शव

इस घटना के चार दिन बाद 27 अगस्त 2011 को पुलिस ने सूचक की मौजूदगी में जंगल की एक खाई से दोनों के सड़े-गले शव बरामद किये गए जिनकी गाला रेतकर हत्या कर दी गई थी. इस मामले में चाईबासा सिविल कोर्ट ने  26 मई 2017 को अपना फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सजा सुनाई थी. इस आदेश के खिलाफ दोषियो  ने झारखण्ड हाईकोर्ट में क्रिमिनल अपील दायर की थी. अपील दायर करने वालों की ओर से हाईकोर्ट के अधिवक्ता मनोज चौबे ने बहस की.

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2017 में निचली अदालत ने सुनाई थी उम्रकैद 

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले के कानूनी और जमीनी पहलुओं की गहन समीक्षा की और पाया कि निचली अदालत का फैसला केवल एक कथित चश्मदीद गवाह (मृतक का भाई) के विरोधाभासी बयानों पर आधारित था जिसे कानून की कसौटी पर सही नहीं पाया जा सका. इस मामले में अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है. इसी आधार पर अदालत ने निचली अदालत के आदेश को निरस्त करते हुए चारो अपील को स्वीकार कर लिया और जेल में बंद मोहन बोदरा, गार्दी जामुदा, कानूराम बोदरा, बाल कृष्ण बोदरा को तुरंत रिहा करने का निर्देश जारी किया है. खुद को बेगुनाह साबित करने की इस लंबित कानूनी लड़ाई के दौरान मोहन बोदरा, गार्दी जामुदा, कानूराम बोदरा, बाल कृष्ण बोदरा को लगभग 14 साल जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा.

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