विनीत आभा उपाध्याय
Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने जामताड़ा के एक दंपती की शादी को भंग (तलाक) करने के फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है. पति-पत्नी पिछले 36 वर्षों से अलग रह रहे थे. अदालत ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि यह रिश्ता अब एक “डेड वुड मैरिज” (मृत लकड़ी के समान रिश्ता) बन चुका है, जिसमें सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है. झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की. संध्या देवी द्वारा फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दायर की गई थी. अदालत में पेश दस्तावेजों के अनुसार संध्या देवी और राजेश सिंह की शादी मई 1984 में हुई थी और उनकी एक बेटी है. वर्ष 1990 से ही दोनों अलग रहने लगे थे. इस दौरान दोनों के बीच लंबी कानूनी लड़ाई चली. पत्नी ने आपराधिक और भरण-पोषण से जुड़े मामले दर्ज कराए, जबकि पति अदालत के आदेशों के अनुसार लगातार गुजारा भत्ता देता रहा. हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दशकों की मुकदमेबाजी के बाद भी दोनों के साथ रहने की कोई संभावना नहीं बची है.
पति की आय और सेवानिवृत्ति लाभ का अदालत ने किया आकलन
तलाक को मंजूरी देने के साथ ही कोर्ट ने पत्नी की आर्थिक सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया. अदालत ने पति की वित्तीय क्षमता का आकलन करने के लिए चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स (CLW) के महाप्रबंधक को पक्षकार बनाते हुए विस्तृत जानकारी मांगी. CLW द्वारा दाखिल हलफनामे में बताया गया कि राजेश कुमार सिंह वहां सीनियर टेक्नीशियन के पद पर कार्यरत हैं और 31 अगस्त 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं. सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और प्रोविडेंट फंड मिलाकर करीब 38 लाख रुपये प्राप्त होंगे. इसके अलावा उन्हें महंगाई राहत सहित लगभग 48 हजार रुपये मासिक पेंशन भी मिलेगी. अदालत ने इन सभी तथ्यों को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले का विस्तृत मूल्यांकन किया.
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गुजारा भत्ता बढ़ाकर 40 लाख, किश्तों में भुगतान का निर्देश
कोर्ट ने माना कि 55 वर्षीय संध्या देवी के पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है. भविष्य में बढ़ती महंगाई और स्वास्थ्य संबंधी खर्चों को देखते हुए अदालत ने कहा कि केवल पूर्व निर्धारित 10 लाख रुपये की राशि पर्याप्त नहीं है. कोर्ट ने यह भी माना कि पति की पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों को देखते हुए पत्नी की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है. इसी आधार पर अदालत ने स्थायी गुजारा भत्ता की राशि 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 40 लाख रुपये कर दी. हाईकोर्ट ने राजेश कुमार सिंह को निर्देश दिया है कि वह 12 महीनों के भीतर चार समान किश्तों में यह राशि अदा करें. पहली किश्त का भुगतान आदेश के एक महीने के भीतर करना होगा. अदालत ने स्पष्ट किया है कि भुगतान नहीं होने की स्थिति में पत्नी कानूनी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगी.


