Hazaribagh: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में झारखंड की माटी का योगदान अप्रतिम रहा है. वर्ष 1855 में सिदो-कान्हू के आह्वान पर संथाल परगना से ब्रिटिश हुकूमत, शोषक महाजनों और जमींदारों (दिकुओं) के खिलाफ संथाल हूल का बिगुल फूंका गया, जिसकी गूंज हजारीबाग जिले के सुदूरवर्ती टाटीझरिया प्रखंड तक भी पहुंची. जल, जंगल और जमीन की अस्मिता की रक्षा के लिए यहां के वीर आदिवासियों ने अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों के सामने पारंपरिक तीर-धनुष के साथ मोर्चा संभाल लिया.
बेडमक्का-नारायणपुर के बीच हुई थी आर-पार की जंग
इतिहास के पन्नों और स्थानीय बुजुर्गों की लोकश्रुतियों के अनुसार, टाटीझरिया प्रखंड की खैरा पंचायत अंतर्गत बेडमक्का और नारायणपुर के बीच स्थित सिमरादाब के पास संथालों और अंग्रेजों के बीच एक भीषण एवं ऐतिहासिक युद्ध हुआ था. यह संघर्ष इतना भयावह था कि आज भी उस रणभूमि को स्थानीय लोग लड़ाईटांड़ के नाम से जानते हैं. यह स्थान आज भी पूर्वजों के अदम्य साहस और शहादत की गवाही देता है.

पूतो के लुबिया मांझी ने संभाली थी कमान
टाटीझरिया की धरती पर इस ऐतिहासिक विद्रोह का नेतृत्व वीर लुबिया मांझी ने किया था. उनके एक आह्वान पर क्षेत्र का बच्चा-बच्चा अपनी माटी की रक्षा के लिए मर-मिटने को तैयार हो गया था. स्थानीय इतिहास के अनुसार, इस युद्ध के बाद बदले हालात में कई विद्रोही परिवार पूतो गांव छोड़कर तुर्कडीह और सूरजकुंड क्षेत्र की ओर विस्थापित हो गए. आज भी वीर लुबिया मांझी के वंशज पूतो गांव में रहते हैं. उनके वंशज अर्जुन मांझी अपने परिवार के साथ वहीं निवास कर रहे हैं.
लड़ाईटांड़ का स्वर्णिम इतिहास, युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा
यह आंदोलन केवल स्वतःस्फूर्त नहीं था, बल्कि पूरी तरह संगठित भी था. टाटीझरिया प्रखंड के सिमरादाब, करम्बा, पूतो, हरदिया, पानिमाको, सिजुवा और जेरुवाडीह समेत अन्य गांवों के आदिवासियों ने डुगडुगी बजाकर समाज को एकजुट किया. आंदोलनकारियों ने झरपो-राजगढ़ को अपना प्रमुख केंद्र बनाया और वहीं से विद्रोह का शंखनाद किया. रणनीति के तहत यहां के वीर क्रांतिकारी बैलगाड़ियों पर सवार होकर रांची की ओर कूच कर गए. इस महासंग्राम में टाटीझरिया के अनेक अनाम वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी.
दशकों तक इस ऐतिहासिक रणभूमि और आसपास के गांवों में हूल क्रांति की स्मृति में लोग एकत्रित होकर अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करते रहे हैं. आज भी सिमरादाब से लेकर खैरा तक के क्षेत्र में सखुआ पत्ती से जुड़ी वह ऐतिहासिक चेतना तथा जल, जंगल और जमीन की रक्षा का संकल्प जनजातीय समाज के लोकगीतों और संस्कृति में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. हूल दिवस पर लड़ाईटांड़ का यह स्वर्णिम इतिहास आज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों, संघर्ष और स्वाभिमान से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है.
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