विशेष रिपोर्ट
Saraikela: झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में ईचा डैम परियोजना केवल कंक्रीट का एक ढांचा मात्र नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र की जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और लाखों किसानों के भविष्य की जीवनरेखा है. इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर अब तक हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जा चुके हैं. भूमि अधिग्रहण से लेकर नहरों के जाल बिछाने तक का काम शत-प्रतिशत पूरा हो चुका है, लेकिन मुख्य बांध (डैम) का निर्माण कार्य अधूरा होने के कारण यह पूरी योजना अंतिम छोर पर आकर थमी हुई है.


60,000 हेक्टेयर भूमि की प्यास बुझाने का है लक्ष्य
– यदि ईचा डैम परियोजना का निर्माण कार्य पूरी तरह संपन्न हो जाता है, तो कोल्हान प्रमंडल की कृषि व्यवस्था में एक युगांतरकारी बदलाव आएगा.
– इस परियोजना के पूरे होने से लगभग 60 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को सुनिश्चित सिंचाई की सुविधा मिलेगी, जिससे किसान साल में तीन फसलें ले सकेंगे.
– रोजगार और खेती के अभाव में गांवों से होने वाला युवाओं का पलायन न्यूनतम स्तर पर आ जाएगा.
– बड़े पैमाने पर जल संरक्षण होने से क्षेत्र का भूजल स्तर तेजी से सुधरेगा, जिससे कुएं और चापाकल गर्मियों में भी नहीं सूखेंगे.
– यह परियोजना कोल्हान को सूखा और जल संकट के दंश से हमेशा के लिए राहत दिलाएगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नया बूस्ट देगी.
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नहरों का नेटवर्क तैयार, बस पानी छूटने का इंतजार
– परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके वितरण तंत्र का काम लगभग पूरा हो चुका है. अरबों रुपये की लागत से मुख्य नहरों के साथ-साथ दर्जनों ब्रांच और माइनर नहरें बनकर तैयार हैं, जो इस प्रकार फैली हैं.
– दायां मुख्य नहर: इसकी लंबाई 32 किलोमीटर है. इससे प्रभावित होने वाले क्षेत्र सरायकेला जिले के राजनगर और चांडिल क्षेत्र में फैली हुई है.इस मुख्य नहर से जुड़े तमाम छोटे ब्रांच और माइनर नहरों का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है.
– बायां मुख्य नहर: इस तरफ लंबाई 19 किलोमीटर है. यह नहर मुख्यत पश्चिमी सिंहभूम जिले के तांतनगर और चाईबासा क्षेत्र को कवर करती है. इस हिस्से में भी नहरों का जाल पूरी तरह बिछ चुका है और यह सिंचाई के लिए पूरी तरह तैयार है.

सब कुछ तैयार, फिर कहां फंसा है पेंच?
विभागीय सूत्रों और जमीनी हकीकत के अनुसार, इस परियोजना का सबसे कठिन माना जाने वाला हिस्सा भूमि अधिग्रहण पूरी तरह से संपन्न हो चुका है. किसानों को मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया भी बड़े पैमाने पर की गई है. नहरें खेतों के मुहाने तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जब तक मुख्य डैम का निर्माण कार्य पूरा नहीं होता, तब तक इन नहरों में पानी की एक बूंद भी नहीं छोड़ी जा सकती.
