अंदर की बातः अपनों के ही चक्रव्यूह में घिरी सरकार, कांग्रेस कोटे के मंत्री आए आमने-सामने, अब सीएम का फैसला तय करेगा भविष्य

Ranchi: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) का भाषा विवाद अब सिर्फ एक नीतिगत गतिरोध नहीं, बल्कि राज्य के सियासी गलियारों में अस्मिता...

Ranchi: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) का भाषा विवाद अब सिर्फ एक नीतिगत गतिरोध नहीं, बल्कि राज्य के सियासी गलियारों में अस्मिता और वजूद की एक आक्रामक जंग बन चुका है. वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की अध्यक्षता में हुई मंत्री समूह की विशेष और अंतिम बैठक किसी ‘आम सहमति’ पर पहुंचने के बजाय भारी अंतर्विरोधों और तीखी फूट की भेंट चढ़ गई. इस हाई-वोल्टेज बैठक ने न केवल सरकार के भीतर की रार को सार्वजनिक किया, बल्कि कांग्रेस के अंतर्द्वंद्व को भी चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है. बैठक के बाद यह साफ हो गया है कि मंत्रियों की आपसी खींचतान के बाद अब इस पूरे भाषाई दंगल का अंतिम फैसला मुख्यमंत्री के न्याय और राजनीतिक सूझबूझ पर टिक गया है.

नए मंत्रियों की एंट्री और विरोध की नई दीवार

इस विशेष समिति में हाल ही में शामिल किए गए दो नए चेहरों शिल्पी नेहा तिर्की और हफीजुल हसन ने बैठक में कदम रखते ही कड़ा रुख अख्तियार कर लिया. दोनों ही मंत्रियों ने अंगिका, भोजपुरी और मगही को क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में शामिल करने के प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया. इनका तर्क था कि स्थानीय जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के वजूद और उनकी विशिष्टता को अक्षुण्ण रखना राज्य की प्राथमिकता होनी चाहिए. नए मंत्रियों के इस आक्रामक रुख ने समिति के भीतर पहले से सुलग रही असहमति की आग में घी डालने का काम किया.

कांग्रेस में महा-फूट: आमने-सामने आए दिग्गज

भाषा के इस संवेदनशील मसले पर सत्ताधारी गठबंधन की प्रमुख साझीदार कांग्रेस के भीतर की दरार भी खुलकर सामने आ गई है. एक तरफ जहां वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर और दीपिका पांडेय सिंह अंगिका, भोजपुरी और मगही जैसी जनभाषाओं को जेटेट की सूची में शामिल करने के पक्ष में मजबूती से डटे रहे, वहीं दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी और गठबंधन के साथी, विशेषकर शिल्पी नेहा तिर्की ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया. कांग्रेस के भीतर का यह बिखराव दिखाता है कि वोट बैंक और क्षेत्रीय राजनीति के दबाव में पार्टी के नेता खुद दो धड़ों में बंट चुके हैं.

राधा किशोर का सीधा प्रहार

बैठक के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर का तेवर बेहद तार्किक था. उन्होंने राज्य की जनसांख्यिकी का हवाला देते हुए एक बड़ा भावनात्मक और राजनीतिक दांव खेला. किशोर ने दो टूक कहा, कि जिस तरह झारखंड के जनजातीय लोग झारखंडी हैं, ठीक उसी तरह सदियों से यहां रह रहे गैर-जनजातीय लोग भी कम झारखंडी नहीं हैं. उनके अधिकारों की अनदेखी कर एकतरफा फैसला नहीं थोपा जा सकता. उन्होंने मुख्यमंत्री को बिना किसी दबाव के जनहित में फैसला लेने की सलाह देते हुए कहा कि सरकार में मंत्रियों की संख्या बल या किसका विरोध कितना है, यह महत्वपूर्ण नहीं है. मुख्यमंत्री को सापेक्ष रूप से मंत्रियों के नफा-नुकसान को देखे बिना एक न्यायपूर्ण और व्यावहारिक निर्णय लेना चाहिए.

गढ़वा ‘डीएसई’ की रिपोर्ट ने पलटा पासा

राधाकृष्ण किशोर ने बैठक में गढ़वा के जिला शिक्षा अधीक्षक की उस चौंकाने वाली रिपोर्ट को भी टेबल पर रखा, जिसने नीति निर्धारकों के दावों की हवा निकाल दी है. उन्होंने कहा, कि गढ़वा जिले में मगही बोलने वालों की संख्या 1 लाख से अधिक है. भोजपुरी बोलने वालों की भी यहां बहुत अच्छी-खासी तादाद है. पूरे जिले में नागपुरी बोलने वाले मुश्किल से 3 से 4 हजार लोग हैं. जब पलामू और गढ़वा जैसे जिलों के स्कूलों में नागपुरी की पढ़ाई ही नहीं होती, तो इसे वहां की जेटेट क्षेत्रीय भाषा सूची में क्यों लाया गया? वहां के छात्र बिना पढ़े इस परीक्षा को कैसे पास कर पाएंगे? यह सीधे तौर पर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है.

द्वितीय भाषा बने ‘हिंदी’

वित्त मंत्री ने साफ किया कि बैठक में जनजातीय भाषाओं के महत्व और उनके अस्तित्व को बचाने पर सभी मंत्री सहमत थे, उस पर कोई विवाद नहीं है. लेकिन जिन जिलों में अंगिका, भोजपुरी और मगही का दबदबा है, वहां के छात्रों को परीक्षा में बैठने का समान अवसर मिलना ही चाहिए. इसका सबसे सटीक और बीच का रास्ता सुझाते हुए उन्होंने कहा कि यदि सरकार इन तीनों भाषाओं को सीधे क्षेत्रीय सूची में शामिल करने से हिचक रही है, तो पलामू, गढ़वा जैसे प्रभावित जिलों के लिए ‘हिंदी’ को अनिवार्य रूप से द्वितीय भाषा के रूप में शामिल कर दिया जाए. इससे भाषाई संतुलन भी बना रहेगा, स्थानीय छात्रों का हक भी नहीं मरेगा और सारा विवाद एक झटके में हल हो जाएगा. राधाकृष्ण किशोर ने स्पष्ट कर दिया है कि मंत्री समूह की यह अंतिम बैठक थी और समिति ने अपनी तरफ से सारी कड़ियों को टटोल लिया है. अब गेंद पूरी तरह से मुख्यमंत्री के पाले में है. अब पूरे झारखंड की नजरें अब सीएम सचिवालय के अंतिम आदेश पर टिकी हैं.

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