रांची: झारखंड विधानसभा में रिक्त पदों और आउटसोर्सिंग के माध्यम से हो रही नियुक्तियों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली. राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह आउटसोर्सिंग की प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की दिशा में काम कर रही है और उसका मुख्य ध्यान स्थाई नियुक्तियों पर है.
विधानसभा में गूंजा नियुक्तियों का मुद्दा:
सदन की कार्यवाही के दौरान भाजपा विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी ने राज्य के विभिन्न विभागों में खाली पड़े पदों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया. उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर विभागों द्वारा नई नियुक्तियों के लिए अधियाचना भेजने में देरी क्यों की जा रही है. जवाब में मंत्री दीपक बिरुवा ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा, जैसे-जैसे विभागों से रिक्त पदों की सूची प्राप्त होती है, सरकार अविलंब जेपीएससी और जेएसएससी को अधियाचना भेज देती है. नियुक्ति एक सतत प्रक्रिया है और सरकार इसे पूरी पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ा रही है.

आउटसोर्सिंग पर विपक्ष का प्रहार:
भाजपा विधायक सीपी सिंह ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि 2019 से सत्ता में होने के बावजूद सरकार अब तक नियुक्तियों के लिए ठोस ढांचा तैयार नहीं कर पाई है. उन्होंने कहा कि वर्तमान में लगभग सभी विभाग आउटसोर्सिंग के भरोसे चल रहे हैं.सिंह ने मांग की कि सरकार आर्थिक समस्याओं का बहाना बनाना छोड़कर नियुक्तियों के लिए एक निश्चित समय सीमा निर्धारित करे.
सत्ता पक्ष का पलटवार, विपक्ष की देन है:
बहस के दौरान मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया,उन्होंने तर्क दिया कि राज्य में आउटसोर्सिंग की प्रथा की शुरुआत पिछली विपक्षी सरकारों के कार्यकाल में ही हुई थी. हेमंत सरकार इस आउटसोर्सिंग कल्चर को खत्म करने की दिशा में गंभीर है. पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने रिकॉर्ड 30,000 से अधिक पदों पर स्थाई नियुक्तियां सुनिश्चित की हैं.
40,000 से अधिक कर्मी आउटसोर्सिंग है:
एक अनुमान के मुताबिक, वर्तमान में झारखंड के विभिन्न सरकारी विभागों में 40,000 से अधिक कर्मी आउटसोर्सिंग के माध्यम से काम कर रहे हैं. इन कर्मियों के भविष्य और स्थाई नियुक्तियों के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.
