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झारखंड के स्वर्ण भंडार पर लगा है ग्रहण, नीलामी की रेस में पिछड़ता रत्नागर्भा प्रदेश

रांची: खनिज संपदा से भरपूर होने के कारण झारखंड को ‘रत्नागर्भा’ कहा जाता है, लेकिन अब यही पहचान सवालों के घेरे में...

रांची: खनिज संपदा से भरपूर होने के कारण झारखंड को ‘रत्नागर्भा’ कहा जाता है, लेकिन अब यही पहचान सवालों के घेरे में नजर आ रही है. एक ओर केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में देशभर में 200 खनिज ब्लॉकों की रिकॉर्ड नीलामी कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है, वहीं झारखंड की कई अहम खनिज परियोजनाएं अब भी प्रशासनिक और तकनीकी अड़चनों में उलझी हुई हैं.

सोने की खदानों की मौजूदा स्थिति

राज्य के तमाड़ (रांची) स्थित पहाड़िया क्षेत्र और सरायकेला-खरसावां के कुंदरकोचा में सोने के भंडार चिन्हित किए जा चुके हैं. कुंदरकोचा में सीमित स्तर पर खनन भी हुआ है, लेकिन बड़े स्तर पर कमर्शियल माइनिंग की प्रक्रिया अब भी आगे नहीं बढ़ पाई है. कई स्थानों पर छोटे स्तर के टेंडर जरूर जारी हुए हैं, लेकिन बड़े गोल्ड ब्लॉकों की नीलामी अब भी लंबित है और निवेशकों का उत्साह अपेक्षा के अनुरूप नहीं दिख रहा है.

फॉरेस्ट और पर्यावरण क्लीयरेंस सबसे बड़ी बाधा

खनन परियोजनाओं में सबसे बड़ी रुकावट फॉरेस्ट क्लीयरेंस और पर्यावरण मंजूरी को लेकर सामने आ रही है. हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा 11 क्रिटिकल मिनरल ब्लॉकों की नीलामी रद्द की गई, जिसमें झारखंड के कुछ हिस्से भी प्रभावित हुए. इसका प्रमुख कारण योग्य बोलीदाताओं की कमी बताया गया.

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निवेशकों की कमी से अटकी प्रक्रिया

लिथियम और कोबाल्ट जैसे रणनीतिक खनिजों के लिए झारखंड में ब्लॉक चिन्हित तो हैं, लेकिन तकनीकी रूप से सक्षम निवेशकों की कमी के कारण नीलामी प्रक्रिया प्रभावित हो रही है. हाल ही में छठे दौर की नीलामी भी इसी वजह से रद्द करनी पड़ी, जिससे राज्य की खनन संभावनाओं को झटका लगा है.

पुरानी खदानें बन रहीं बोझ

धनबाद और हजारीबाग जैसे इलाकों में संचालित कोयला खदानों का बड़ा हिस्सा 2030 तक घाटे का सौदा बन सकता है. इस स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार अब पारंपरिक खनन के बजाय ग्रीन एनर्जी की दिशा में ध्यान केंद्रित कर रही है. इससे खनन क्षेत्र में निवेश की गति और धीमी हो गई है.

भूमि अधिग्रहण और विस्थापन की चुनौती

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी स्पष्ट किया है कि राज्य अब केवल कच्चा माल निकालने के बजाय वैल्यू एडिशन पर फोकस करेगा. हालांकि, भूमि अधिग्रहण की जटिल प्रक्रियाएं और विस्थापन से जुड़े मुद्दे बड़े प्रोजेक्ट्स के रास्ते में बड़ी बाधा बने हुए हैं.

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