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Ranchi: झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ मोरहाबादी के बापू वाटिका से उठी चिंगारी अब एक सुलगती बहस में तब्दील हो चुकी है. सत्ता के गलियारों से लेकर राजधानी की सड़कों तक गूंज रहा यह आंदोलन महज कुछ परीक्षाओं को रद्द कराने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके सामने एक बड़ा वैचारिक संकट खड़ा हो गया है. सवाल यह है कि क्या यह न्याय की आस लगाए बैठे युवाओं का शुद्ध छात्र आंदोलन है, या फिर यह धीरे-धीरे झारखंड की कुटिल राजनीतिक बिसात का एक नया मोहरा बनता जा रहा है?


बापू वाटिता से शुरू हुई थी न्याय की हुंकार
25 जुलाई को जब रांची के मोरहाबादी स्थित गांधी पार्क में युवाओं ने डेरा डाला, तो मकसद साफ था—जेपीएससी की परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष सीबीआई जांच और भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ के खिलाफ आर-पार की लड़ाई. शुरुआती दौर में जेएलकेएम से जुड़े छात्र नेता देवेंद्र नाथ और विभिन्न छात्र संगठनों ने इस चिंगारी को हवा दी. हर प्रतियोगी छात्र की जुबान पर एक ही सवाल था कि आखिर उनकी मेहनत और भविष्य के साथ कब तक खिलवाड़ होता रहेगा. शुरुआत में यह पूरी तरह युवाओं के स्वतः स्फूर्त आक्रोश का प्रतीक था, जिसमें किसी राजनीतिक झंडे या एजेंडे के लिए कोई जगह नहीं थी.

ताकत या आंदोलन का अपहरण
जैसे-जैसे आंदोलन ने तूल पकड़ा, सूबे के तमाम राजनीतिक दलों और नेताओं की नजरें इस पर टिक गईं. एक तरफ जहां कई छात्र यह मानते हैं कि आंदोलन की पवित्रता बनाए रखने के लिए इसे पूरी तरह गैर-राजनीतिक रखना अनिवार्य है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों की एंट्री ने समीकरण बदल दिए हैं.
सत्ता और विपक्ष की सक्रियता
पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की ने छात्रों के लिए भोजन और पेयजल की व्यवस्था कर मानवीय संवेदनशीलता दिखाई, हालांकि उन्होंने खुद को मंच से दूर रखा. वहीं रांची की मेयर रोशनी खलखो ने भी पहुंचकर नैतिक समर्थन दिया. जेएलकेएम विधायक जयराम महतो से लेकर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, सांसद संजय सेठ, निशिकांत दुबे, दीपक प्रकाश और मनीष जायसवाल जैसे बड़े नेताओं ने मुखर होकर इस आंदोलन का समर्थन किया है. अभिजीत दीपके के भी रांची पहुंचने की सुगबुगाहट ने इसमें तड़का लगा दिया है. समाजवादी पार्टी के सांसद सरोज यादव ने वीडियो कॉल के जरीए भी छात्रों से बात की है. छात्रों का समर्थन करते हुए कहा कि लोकसभा में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है. छात्रों के साथ खड़े रहने का आश्वासन भी दिया.
दो फाड़ होती सोच: न्याय बनाम सियासत
छात्रों के बीच अब वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं. पहला वर्ग मानता है कि जब आंदोलन में राजनेता अपनी रोटियां सेकने लगते हैं, तो मूल मुद्दे यानी ‘परीक्षा सुधार और सीबीआई जांच’ की मांगें पृष्ठभूमि में चली जाती हैं और राजनीतिक बयानबाजी हेडलाइन बन जाती है. इनका तर्क है कि राजनीति की इस बैसाखी से छात्र आंदोलन अपनी धार खो देगा. दूसरा वर्ग इसे व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखता है. उनका मानना है कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए मजबूत राजनीतिक समर्थन एक उत्प्रेरक का काम करता है. जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक हर उस मंच और आवाज का स्वागत किया जानाა चाहिए जो छात्रों के हक में खड़ी हो.
आने वाले कल की तस्वीर
जेपीएससी को लेकर सुलग रही यह आग अब केवल राजधानी की सड़कों का भूगोल तय नहीं करेगी, बल्कि आने वाले दिनों में झारखंड के राजनीतिक भविष्य का तापमान भी तय करेगी. क्या यह आंदोलन अपनी मूल छात्र-हितैषी पहचान को बचाते हुए दोषियों को झुकाने में कामयाब होगा, या फिर यह राजनीतिक दलों के वैचारिक द्वंद और बयानबाजी की भेंट चढ़कर दम तोड़ देगा? इसका जवाब आने वाला वक्त ही देगा, लेकिन फिलहाल रांची की फिजाओं में सिर्फ एक ही गूंज है,न्याय चाहिए, और वह भी बिना किसी राजनीतिक सौदेबाजी के.
अभिनय सर भी पहुंचे छात्रों के समर्थ में
अभिनय सर जो गणित के जाने माने टीचर है. वो रांची पहुंचे है जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में वो स्टूडेंट्स की समर्थन देने आए है. बता दें इससे पहले उन्होंने अपना वीडियो साझा करते हुए झारखंड के स्टूडेंट्स को समर्थन देने की बात कही थी.

