झारखंड की पारंपरिक वनस्पति कुदरुम, स्वाद के साथ सेहत के लिए भी मानी जाती है खास

News Wave Desk : झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में कई ऐसी पारंपरिक वनस्पतियां पाई जाती हैं, जो न केवल स्थानीय...

Kudrum
Kudrum

News Wave Desk : झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में कई ऐसी पारंपरिक वनस्पतियां पाई जाती हैं, जो न केवल स्थानीय खान-पान का हिस्सा हैं, बल्कि अपने औषधीय गुणों के लिए भी जानी जाती हैं. इन्हीं में से एक है कुदरुम. स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय कुदरुम को कई जगह रोसेल के नाम से भी जाना जाता है. इसका स्वाद हल्का खट्टा होता है और झारखंडी व्यंजनों में इसका विशेष महत्व है. कुदरुम एक झाड़ीनुमा पौधा होता है, जो सामान्य तौर पर करीब 4 से 7 फीट तक ऊंचा हो सकता है. इसके पत्ते हरे होते हैं, जबकि पौधे के कुछ हिस्सों में लाल रंग की झलक दिखाई देती है. ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसे पारंपरिक रूप से जंगल और खेतों के आसपास से एकत्र कर अपने भोजन में इस्तेमाल करते हैं.

साग, चटनी और अचार में होता है इस्तेमाल

कुदरुम का इस्तेमाल मुख्य रूप से साग, चटनी और अचार बनाने में किया जाता है. इसके खट्टे स्वाद के कारण इससे तैयार व्यंजन खाने में काफी स्वादिष्ट लगते हैं. बदलते समय के साथ अब कुदरुम का इस्तेमाल जैम, सिरप और हर्बल चाय जैसे उत्पादों में भी किया जाने लगा है. कुदरुम में विटामिन-सी, आयरन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. यही वजह है कि इसे पारंपरिक रूप से सेहत के लिए उपयोगी माना जाता है. ग्रामीण और आदिवासी समुदाय लंबे समय से इसे अपने खान-पान का हिस्सा बनाते आए हैं.

Kudrum Usage
Kudrum Usage

 

पारंपरिक पहचान को बचाने की जरूरत

कुदरुम झारखंड की पारंपरिक वनस्पतियों और स्थानीय खान-पान की समृद्ध विरासत का हिस्सा है. हालांकि, आधुनिक खान-पान के बढ़ते प्रभाव के कारण कई पारंपरिक खाद्य पदार्थ लोगों की रोजमर्रा की थाली से दूर होते जा रहे हैं. ऐसे में कुदरुम जैसी स्थानीय वनस्पतियों को संरक्षित करने और इनके महत्व को लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है. कुदरुम सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि झारखंड की पारंपरिक संस्कृति, स्वाद और प्राकृतिक विरासत से जुड़ी एक खास पहचान है.

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