जमीन गई, गांव उजड़े, पीढ़ियां बीत गईं- फिर भी नहीं मिला हक,कोनार विस्थापितों ने छेड़ी निर्णायक लड़ाई

Hazaribagh: के विकास के लिए कभी जिन लोगों ने अपनी जमीन, अपना घर, अपनी पहचान और अपना गांव तक कुर्बान कर दिया...

Hazaribagh: के विकास के लिए कभी जिन लोगों ने अपनी जमीन, अपना घर, अपनी पहचान और अपना गांव तक कुर्बान कर दिया था, आज वही लोग अपने ही अधिकार के लिए भटकने को मजबूर हैं. कोनार डैम निर्माण के नाम पर विस्थापित हुए हजारों परिवारों का दर्द अब आक्रोश में बदल चुका है. 70 वर्षों से जमीन के मालिकाना हक और रसीद की मांग कर रहे विस्थापितों ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है.

विस्थापितों की चेतावनी

डीवीसी विस्थापित संघर्ष मोर्चा ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो 18 मई 2026 से अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया जाएगा. इसको लेकर मोर्चा की ओर से उप महाप्रबंधक डीवीसी कोनार डैम, अनुमंडल पदाधिकारी सदर हजारीबाग और अंचल अधिकारी विष्णुगढ़ को एक सूत्री मांग पत्र सौंपा गया है.

हजारों परिवारों को किया गया विस्थापित

मोर्चा के प्रखंड अध्यक्ष सुशील कुमार महतो ने कहा कि कोनार डैम निर्माण के दौरान हजारों परिवारों को उनकी पुश्तैनी जमीन से उजाड़कर दूसरी जगह बसाया गया. उस समय लोगों को भरोसा दिलाया गया था कि उन्हें जमीन का पूरा अधिकार मिलेगा. विस्थापितों को पर्चा तो दिया गया, लेकिन आज तक जमीन का कानूनी मालिकाना हक नहीं मिला.

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तीसरी और चौथी पीढ़ी भुगत रही विस्थापन का दंश

उन्होंने कहा कि इसका खामियाजा अब तीसरी और चौथी पीढ़ी तक भुगत रही है. जमीन की वैध रसीद नहीं होने के कारण हजारों परिवार सरकारी योजनाओं, बैंक ऋण, आवास योजना, पेंशन, जाति और आवासीय प्रमाण पत्र जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. हर सरकारी काम में उन्हें अपमान और परेशानी का सामना करना पड़ता है.

सैकड़ों एकड़ जमीन फाइलों में दफन

विस्थापित संघर्ष मोर्चा के अनुसार कई गांवों की विशाल जमीन का मामला आज भी लंबित पड़ा है. बनासो नावाटांड की लगभग 650 एकड़, गरहमुर्गी की 84 एकड़, हेठली मुरगांव की 125 एकड़ 36 डिसमिल, महतोईया की 121 एकड़ 24 डिसमिल, खरखुंदो की 118 एकड़ तथा चितरामो की 75 एकड़ 2 डिसमिल जमीन का मालिकाना हक आज तक विस्थापितों को नहीं मिल सका है.

विकास की कीमत सिर्फ विस्थापित ही क्यों चुकाएं?

मोर्चा नेताओं का कहना है कि देश को डैम मिला, बिजली मिली, सिंचाई मिली, लेकिन विस्थापितों को बदले में सिर्फ इंतजार, संघर्ष और उपेक्षा मिली. वर्षों तक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के चक्कर काटने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई है.

हमें आश्वासन नहीं, अधिकार चाहिए

सुशील कुमार महतो ने साफ कहा कि अब विस्थापित सिर्फ आश्वासन नहीं, अपना अधिकार चाहते हैं. यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा और विस्थापित निर्णायक संघर्ष के लिए बाध्य होंगे.

1955 का दंश और बदल गई ग्रामीणों की जिंदगी

गौरतलब है कि वर्ष 1955 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru ने कोनार डैम का उद्घाटन किया था. विकास की इस बड़ी परियोजना ने जहां देश को नई दिशा दी, वहीं हजारों परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन लोगों ने विकास के लिए अपना सबकुछ गंवाया, उन्हें आज तक अपने अधिकार के लिए लड़ना पड़ रहा है.

कोनार विस्थापितों की यह लड़ाई अब सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि सम्मान, पहचान और न्याय की लड़ाई बन चुकी है.

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