Ranchi: झारखंड एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट से गुजर रहा है. मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह बाधित हुई है. झारखंड विधानसभा में पेश किए गए हालिया आंकड़ों के अनुसार, राज्य में कमर्शियल गैस की आपूर्ति में भारी कटौती की गई है, जिससे न केवल आम आदमी की रसोई बल्कि करोड़ों रुपये का टर्नओवर रखने वाला होटल और MSME सेक्टर भी वेंटिलेटर पर आ गया है.
मांग और आपूर्ति में अंतर
राज्य सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड की मासिक व्यावसायिक गैस की आवश्यकता और वर्तमान उपलब्धता के बीच एक गहरी खाई बन गई है. आपूर्ति में लगभग 80 फीसदी की कटौती कर दी गई है.
कारोबार पर असर
गैस संकट का सबसे सीधा असर राज्य के राजस्व और निजी व्यापार पर पड़ा है. जमशेदपुर, रांची और धनबाद जैसे शहरों में हजारों छोटे-बड़े होटल गैस की कमी के कारण या तो बंद होने की कगार पर हैं या कोयले जैसे वैकल्पिक ईंधन पर निर्भर हो गए हैं. इस सेक्टर को प्रतिदिन करोड़ों रुपये के टर्नओवर का नुकसान हो रहा है.
GST में गिरावट की आशंका
वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर के अनुसार, होटलों और औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से राज्य के GST राजस्व में भारी गिरावट दर्ज की जा सकती है, जो सीधे तौर पर राज्य के विकास बजट को प्रभावित करेगा.
बढ़ी उत्पादन लागत
प्लास्टिक उद्योग और मेधा डेयरी जैसे दुग्ध उत्पादों की कीमतों में वृद्धि हुई है, क्योंकि उत्पादन लागत बढ़ गई है. कई छोटी फैक्ट्रियों में उत्पादन आंशिक रूप से ठप हो गया है.
घरेलू उपभोक्ता परेशान
घरेलू गैस की किल्लत को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने सख्त नियम लागू किए हैं. शहरी क्षेत्रों में अब 25 दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन से पहले दोबारा सिलेंडर बुक नहीं किया जा सकता. आपूर्ति कम होने से रिफिल के लिए उपभोक्ताओं को 12-12 घंटे कतारों में लगना पड़ रहा है, जिससे बिचौलियों और ब्लैक मार्केटिंग को बढ़ावा मिल रहा है.
वितरण सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त
गैस खत्म होने के डर से उपभोक्ताओं ने सामान्य से 6 गुना अधिक बुकिंग, प्रतिदिन लगभग 2,500 तक, शुरू कर दी है, जिससे वितरण प्रणाली ध्वस्त हो गई है. तेल विपणन कंपनियों ने प्राथमिकता के आधार पर घरेलू गैस को बचाए रखने के लिए कमर्शियल कोटे में कटौती की है.
फैक्ट फाइल- एक नजर में आंकड़े
- कुल मासिक आवश्यकता. 2,273.11 मीट्रिक टन
- वर्तमान आपूर्ति. मात्र 454.6 मीट्रिक टन
- आपूर्ति में कटौती. लगभग 80 फीसदी
