Saurav Singh
रांची: साल भर ‘कछुआ चाल’ से चलने वाला सरकारी तंत्र अचानक ‘उसेन बोल्ट’ बन गया है. इसका कारण यह है कि कल वित्तीय वर्ष 2025-26 का आखिरी दिन है. झारखंड के सरकारी गलियारों में इन दिनों बस एक ही धुन सुनाई दे रही है, राजस्व लाओ, बजट बचाओ. हालात यह है कि सचिवालय की लिफ्ट से लेकर बाबू की मेज तक, हर जगह बस आंकड़ों की बात ही चल रही है.
झारखंड मंत्रालय: फाइलों की ‘हवाई यात्रा’
धुर्वा स्थित प्रोजेक्ट भवन का नजारा इन दिनों किसी युद्ध स्तर के कंट्रोल रूम जैसा है. यहां के ‘साहब’ जो कल तक “अगले हफ्ते आना” कहते थे, आज खुद फोन घुमाकर पूछ रहे हैं कि पेमेंट का चालान कटा कि नहीं? कहा जा रहा है कि फाइलों की आवाजाही इतनी तेज है कि प्यून (अनुसेवक) भी अब जॉगिंग शूज पहनकर ड्यूटी कर रहे हैं. विभाग के अफसर राजस्व वसूली के लिए ऐसे जी-तोड़ प्रयास में लगे हैं, मानो सारा खजाना कल ही खाली हो जाएगा. टारगेट पूरा करने की ऐसी अग्निपरीक्षा चल रही है कि कुछ बाबू तो सपने में भी एचआरएमएस पोर्टल और ट्रेजरी वाउचर देख रहे हैं.
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नेपाल हाउस: चाय कम, राजस्व ज्यादा
उधर डोरंडा स्थित नेपाल हाउस की रौनक भी देखने लायक है. यहां की कैंटीन में चाय की खपत बढ़ गई है, क्योंकि नींद उड़ाने का यही एकमात्र वैध एनर्जी ड्रिंक बचा है. कृषि, पशुपालन और अन्य विभागों के दफ्तरों में राजस्व वसूली का ऐसा जुनून सवार है कि अगर गलती से कोई आम आदमी वहां पहुंच जाए, तो अफसर उससे भी पूछ बैठते हैं, भाई, कोई टैक्स-वैक्स बाकी है क्या? जमा कर दो, कल आखिरी दिन है.
ऐसे चल रहा दे धनाधन
टारगेट का डर: साल भर जो फाइलें पेंडिंग के हिमालय तले दबी थीं, आज वे अचानक ‘डिजिटल’ पंख लगाकर उड़ रही हैं.
बजट की चिंता: अफसरों की सबसे बड़ी टेंशन यह है कि अगर पैसा खर्च नहीं हुआ तो लैप्स हो जाएगा. इसलिए, अब खर्च कैसे करें, की वैसी ही मीटिंग्स हो रही हैं, जैसे शादी के आखिरी दिन हलवाई के साथ होती है.
अंतिम तिथि का मंत्र: विभाग के कर्मियों के लिए ’31 मार्च’ किसी डरावनी फिल्म के ‘क्लाइमेक्स’ जैसा है, जहां विलेन (टारगेट) को मारना ही एकमात्र लक्ष्य है.
