Ranchi: झारखंड लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली एक बार फिर कटघरे में है. JPSC का चालू वित्तीय वर्ष में कुल बजट 55.33 करोड़ रुपये है, जिसमें से 9.48 करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जा चुके हैं. बावजूद इसके, दो दशक लंबे सफर में JPSC का कोई भी परिणाम ऐसा नहीं रहा जो दूध का दूध और पानी की पानी की तरह साफ साबित हुआ हो. हर परीक्षा, हर परिणाम और हर चयन प्रक्रिया के साथ विवादों का एक नया अध्याय जुड़ता गया है. प्रारंभिक परीक्षा से लेकर मुख्य परीक्षा तक, कॉपियों के मूल्यांकन से लेकर कटऑफ तय करने तक हर मोर्चे पर जेपीएससी की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में रही है.
पहली से छठी JPSC: शुरुआत से ही विवादों का रहा है चोली-दामन का साथ
राज्य गठन के ठीक बाद वर्ष 2003 में जब पहली संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा आयोजित हुई, तो लगा कि झारखंड के युवाओं को उनका हक मिलेगा। लेकिन यह उम्मीदें ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाईं. वर्ष 2005-06 में आयोजित दूसरी जेपीएससी परीक्षा ने ही आयोग के भ्रष्टाचार के द्वार खोल दिए. चयन प्रक्रिया में खुलेआम बरती गई अनियमितताओं के बाद जब जांच बैठी, तो कई बड़े चेहरे बेनकाब हुए और अधिकारियों पर कार्रवाई की गई. इसके बाद वर्ष 2008 में हुई तीसरी जेपीएससी हो या फिर 2012-13 की चौथी और 2015 की पांचवीं JPSC, हर बार नियमावली, कटऑफ, आरक्षण के प्रावधान और परीक्षा पैटर्न को लेकर विवादों का बवंडर उठता रहा. इन सबमें सबसे बदनाम रही वर्ष 2016 की छठी जेपीएससी परीक्षा, जो अपनी सुस्ती, धांधली और लंबी कानूनी लड़ाइयों के लिए जानी गई.
7वीं से 10वीं JPSC : सीरियल रोल नंबर और ओएमआर शीट का रहस्य
बैकलॉग के नाम पर आयोग ने जब 7वीं, 8वीं, 9वीं और 10वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा को एक साथ ले कर वर्ष 2021 में प्रारंभिक परीक्षा आयोजित की, तो अभ्यर्थियों ने जब रिजल्ट का विश्लेषण किया, तो पाया कि एक ही परीक्षा केंद्र से लगातार (सीरियल) रोल नंबर वाले दर्जनों अभ्यर्थियों का चयन हो गया था. इसके अलावा ओएमआर शीट में छेड़छाड़ और कॉपियों के मूल्यांकन में गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगे। रास्तों पर उतरे युवाओं पर लाठियां बरसाई गईं और मामला कोर्ट तक पहुंचा, जिससे जेपीएससी की साख पूरी तरह से रसातल में चली गई.
11वीं से 13वीं JPSC: एक तीर से कई निशाने, लेकिन दाग बरकरार
विवादों से पीछा छुड़ाने के बजाय आयोग ने पुरानी शैली अपनाते हुए 11वीं, 12वीं और 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा को एक बार फिर क्लब करके संयुक्त रूप से आयोजित किया. इस परीक्षा के जरिए 342 पदों पर अंतिम रूप से नियुक्तियां तो पूरी कर ली गईं, लेकिन प्रक्रिया पर से सवालिया निशान हटे नहीं. सफल अभ्यर्थियों की सूची आने के साथ ही नियमों की अनदेखी और पारदर्शिता की कमी के आरोप फिर से गूंजने लगे.
14वीं JPSC : भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा, स्थगित हुई मुख्य परीक्षा और ठप पड़ा सिस्टम
विज्ञापन संख्या 01/2026 के अंतर्गत मात्र 103 पदों के लिए 19 अप्रैल 2026 को प्रारंभिक परीक्षा आयोजित की गई थी। इसके बाद जुलाई 2026 में जब पीटी का परिणाम घोषित हुआ, तो राज्यभर में भूचाल आ गया. छात्रों का सीधा आरोप है कि आयोग ने पारदर्शी तरीके से कटऑफ मार्क्स (Cut-off) तक जारी नहीं किए। ओएमआर शीट के मूल्यांकन और चयन के कई अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं पर भयंकर धांधली बरती गई। रास्तों पर छात्रों का आक्रोश उबल पड़ा.

JPSC का सफर और परीक्षाओं के विवाद
• 2003 (पहली JPSC): 64 पदों के लिए पहली संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन, जो शुरुआत का शंखनाद थी.
• 2005-06 (दूसरी JPSC) : चयन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितता के आरोप लगे, जिसके बाद लंबी जांच और प्रशासनिक कार्रवाई की गई.
• 2008 (तीसरी JPSC): चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हुए और छात्रों का आक्रोश फूटा.
• 2012-13 (चौथी JPSC): नियमावली और कटऑफ को लेकर भारी विवाद, मामला अदालतों की देहरी तक पहुंचा.
• 2015 (पांचवीं JPSC): आरक्षण के नियमों और परीक्षा पैटर्न में मनमाने बदलाव को लेकर तीखा विरोध हुआ.
• 2016 (छठी JPSC): विज्ञापन से लेकर अंतिम परिणाम तक लंबी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह परीक्षा किसी तरह पूरी हो पाई.
• 2021 (7वीं-10वीं JPSC): बैकलॉग खत्म करने के नाम पर एक साथ चार परीक्षाएं कराई गईं, जिसमें सीरियल रोल नंबर घोटाला और ओएमआर शीट में धांधली का बड़ा आरोप लगा.
• 2024 (11वीं-13वीं JPSC): तीन परीक्षाओं को एक साथ जोड़कर 342 पदों पर नियुक्ति पूरी की गई, लेकिन नियम और चयन प्रक्रिया को लेकर अभ्यर्थियों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया.
• 2026 (14वीं JPSC): 19 अप्रैल को प्रारंभिक परीक्षा हुई, जुलाई में रिजल्ट आया और फिर पारदर्शिता के अभाव में विवाद गरमाया. अंततः मुख्य परीक्षा समेत 9 परीक्षाएं टालनी पड़ गई.
