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13 महीने से मानदेय नहीं: 38 हजार आंगनबाड़ी सेविका-सहायिकाएं संकट में, पोषाहार व्यवस्था भी उधारी के सहारे

Saraikela: झारखंड में आंगनबाड़ी सेविका एवं सहायिकाओं की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है. अप्रैल 2025 से अब तक राज्य की...

Saraikela: झारखंड में आंगनबाड़ी सेविका एवं सहायिकाओं की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है. अप्रैल 2025 से अब तक राज्य की करीब 38 हजार आंगनबाड़ी सेविका-सहायिकाओं को मानदेय का भुगतान नहीं हुआ है. नियमानुसार राज्य सरकार की ओर से 5,500 रुपये और केंद्र सरकार की ओर से 4,500 रुपये, यानी कुल 10,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है. करीब 13 महीने से भुगतान लंबित रहने के कारण सेविका-सहायिकाएं आर्थिक संकट से जूझ रही हैं.

पोषाहार व्यवस्था भी उधारी के भरोसे

सिर्फ मानदेय ही नहीं, आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को दिए जाने वाले पोषाहार की राशि का भुगतान भी लंबित बताया जा रहा है. इसके बावजूद सेविकाएं अपनी जेब से खर्च कर और उधारी पर राशन लेकर बच्चों को प्रतिदिन पोषाहार उपलब्ध करा रही हैं. लगातार बढ़ती उधारी के कारण अब दुकानदार भी राशन देने में हिचकिचाने लगे हैं.

सेविकाओं ने बयां किया दर्द

एक सेविका ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि पिछले 13 महीने से एक भी रुपया नहीं मिला है. घर चलाना मुश्किल हो गया है. बच्चों को भूखा नहीं छोड़ सकते, इसलिए उधार लेकर खिचड़ी और दलिया तैयार किया जा रहा है. अब दुकानदार भी उधार देने से मना कर रहे हैं.

CDPO की सूचना के बावजूद समाधान नहीं

मामले को लेकर विभिन्न जिलों के बाल विकास परियोजना पदाधिकारियों (सीडीपीओ) ने कई बार समाज कल्याण विभाग को लिखित जानकारी दी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. विभागीय अधिकारियों के अनुसार फंड आवंटन में तकनीकी अड़चनों के कारण भुगतान प्रभावित हुआ है.

संघ ने दी आंदोलन की चेतावनी

झारखंड राज्य आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका संघ ने इस स्थिति पर नाराजगी जताई है. संघ की ओर से कहा गया है कि सरकार एक तरफ “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा देती है, जबकि जमीनी स्तर पर काम करने वाली सेविकाओं को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है. संघ ने चेतावनी दी है कि यदि 15 दिनों के भीतर बकाया भुगतान नहीं किया गया तो राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा.

पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ रहा असर

आंगनबाड़ी सेविकाएं ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण नियंत्रण, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की देखभाल और प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था की अहम कड़ी मानी जाती हैं. मानदेय और पोषाहार राशि लंबित रहने से न केवल उनके परिवार प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि बच्चों की उपस्थिति और पोषण कार्यक्रमों पर भी असर पड़ने लगा है.

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