Hazaribagh: नगर निगम इन दिनों विकास के एजेंडे से ज्यादा सत्ता, वर्चस्व और व्यक्तिगत अहंकार की जंग का मैदान बना हुआ है. हाल ही में संपन्न नगर निगम चुनाव के बाद जनता ने जिन उम्मीदों के साथ जनप्रतिनिधियों को जिम्मेदारी सौंपी थी, वे उम्मीदें अब टूटती नजर आ रही हैं. शहर की प्रशासनिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच टकराव खुलकर सामने आ चुका है, जिसका सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ रहा है. सूत्रों और स्थानीय लोगों की मानें तो नगर निगम में इस समय “कौन बड़ा-कौन छोटा” की बहस ने कामकाज की गति को बुरी तरह जकड़ लिया है. जनप्रतिनिधि अपनी लोकतांत्रिक वैधता को सर्वोपरि बताते हुए निर्णय प्रक्रिया में हस्तक्षेप की बात कर रहे हैं, वहीं कुछ अधिकारी अपने प्रशासनिक अधिकारों के दायरे को सर्वोच्च मानते हुए अलग रुख अपनाए हुए हैं. इसी खींचतान ने नगर निगम की पूरी कार्यसंस्कृति को प्रभावित कर दिया है. शहर के कई वार्डों में सड़क मरम्मत, साफ सफाई, नाली निर्माण और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कार्य या तो ठप हैं या बेहद धीमी गति से चल रहे हैं.
अहंकार ऑर वर्चस्व की लड़ाई बनती जा रही
यहां तक की जन्म प्रमाण पत्र और मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने में भी महीने दिन लग रहे और आम नागरिकों में लगातार नाराजगी बढ़ती जा रही है. जनता का कहना है कि जिन मुद्दों पर चुनाव में बड़े-बड़े वादे किए गए थे, वे अब फाइलों और बैठकों में उलझकर रह गए हैं. इधर, सोशल मीडिया पर नगर निगम की बैठकों, औपचारिक आयोजनों और फूल मालाओं वाली तस्वीरों की भरमार ने जनता की नाराजगी और बढ़ा दी है. लोगों का कहना है कि जमीनी विकास की जगह दिखावे और प्रचार को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है सूत्रों के अनुसार, जनप्रतिनिधि को मिलने वाली मूलभूत प्रशासनिक सुविधाओं को लेकर भी असंतोष की स्थिति बनी हुई है, जिससे तनाव और गहराता जा रहा है. नगर निगम क्षेत्र की जनता अब खुलकर सवाल उठा रही है कि आखिर विकास किसके भरोसे चलेगा- जनता के चुने प्रतिनिधियों के या सत्ता ऑर अधिकारों की लड़ाई में उलझ सिस्टम के ? स्पष्ट है कि यदि यह स्थिति बनी रही तो शहर का विकास और अधिक धीमा हो सकता है अब नजर इस पर टिकी है कि नगर निगम प्रशासन और जनप्रतिनिधि अपने टकराव को विराम देकर विकास को प्राथमिकता देते हैं या फिर यह “अहंकार और वर्चस्व की लड़ाई” हजारीबाग के भविष्य पर भारी पड़ती रहेगी.

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