News Wave Desk: मोबाइल अब बच्चों का ‘डिजिटल खिलौना’ बन गया है, लेकिन इसकी लत खतरनाक स्तर तक पहुंच रही है. बाल रोग विशेषज्ञों के मुताबिक शहर के क्लीनिक में हर हफ्ते 8-10 ऐसे केस आ रहे हैं जहां 3 से 12 साल के बच्चे दिन में 4-6 घंटे फोन चला रहे हैं. WHO की गाइडलाइन कहती है कि 2-5 साल के बच्चों को दिन में 1 घंटे से ज्यादा स्क्रीन नहीं देखनी चाहिए.
ज्यादा स्क्रीन टाइम से बच्चों में चिड़चिड़ापन, नींद न आना और ‘टेक नेक’ की शिकायतें बढ़ी रही हैं.कई बच्चे फोन छीनने पर रोने-चिल्लाने लगते हैं, खाना भी मोबाइल देखकर ही खाते हैं. लगातार पास से स्क्रीन देखने के कारण 8-10 साल के बच्चों में भी चश्मे लग रहा है. पढ़ाई में ध्यान न लगना और आउटडोर खेल से दूरी मोटापे की वजह बन रही हैं

8 साल में दिमाग का 80% विकास हो जाता है. इससे मोबाइल से ज्यादा भाषा, याददाश्त और सोशल स्किल कमजोर होती हैं. बच्चे कार्टून देखकर बात करना सीख लेते हैं, पर असली लोगों से बात करने में झिझकते हैं.

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रोल मॉडल बनें:
डाइनिंग टेबल और बेडरूम को ‘नो फोन ज़ोन’ घोषित करें.पेरेंट्स खुद खाना खाते वक्त रील्स न देखें.
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टाइम फिक्स करें:
6-12 साल के बच्चों को 1-2 घंटे से ज्यादा फोन न दें। iPhone में Screen Time और Android में Digital Wellbeing से लिमिट सेट करें.
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विकल्प दें:
घर में कलर, किताब, साइकिल, बोर्ड गेम रखें.
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टेक फास्टिंग:
हफ्ते में एक दिन 4 घंटे पूरा परिवार बिना मोबाइल रहे.
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Kids Mode को ऑन करें:
YouTube Kids और Family Link से गलत कंटेंट ब्लॉक करें.
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मोबाइल दुश्मन नहीं, पर लिमिट जरूरी है
अगर बच्चा फोन के बिना खाना न खाए, स्कूल जाने से मना करे या खुद को नुकसान पहुंचाए, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. पेरेंट्स की आदत ही बच्चे की आदत बनती है.
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