Ranchi: राजधानी रांची में स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) अपनी चिकित्सकीय सेवाओं से ज्यादा अपनी अस्थिरता के लिए जाना जाता है. यहां की प्रशासनिक कुर्सी इतनी गर्म है कि उस पर बैठने वाला निदेशक अक्सर समय से पहले ही ठंडा पड़कर इस्तीफा दे देता है. लेकिन इस पूरे ड्रामे के बीच एक और किरदार है जो रिम्स के निदेशकों से ज्यादा चर्चा में रहा है. वह है रिम्स का केली बंगला. जहां से निदेशक तो विदा हो जाते हैं, लेकिन विवादों की सुर्खी हमेशा बरकरार रहती है.
रिम्स की राजनीतिक नस को नहीं पकड़ पाते डायरेक्टर
रिम्स के निदेशकों की फेहरिस्त उठाकर देखिए, तो ऐसा लगेगा मानो वे किसी मेडिकल कॉलेज को नहीं, बल्कि किसी म्यूजिकल चेयर प्रतियोगिता में भाग लेने आए थे. देश के नामी-गिरामी संस्थानों—एम्स दिल्ली, बीएचयू, लेडी हार्डिंग और पीजीआई लखनऊ से आए दिग्गजों ने भी रिम्स की दहलीज लांघते ही अपनी हार स्वीकार कर ली. डॉ. राजकुमार, जो एसजीपीजीआई लखनऊ से बड़े अरमानों के साथ आए थे, उन्होंने भी बाय-बाय कह दिया. इससे पहले डॉ. कामेश्वर प्रसाद, डॉ. डीके सिंह, डॉ. बीएल शेरवाल और डॉ. एनएन अग्रवाल जैसे सूरमाओं का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा. लगता है रिम्स में कोई ऐसी ‘अदृश्य शक्ति’ है जो इन विशेषज्ञों को यह अहसास करा देती है कि दिल्ली और लखनऊ की प्रशासनिक फाइलें और झारखंड के बाहरी हस्तक्षेप में बहुत फर्क है. ये विद्वान डॉक्टर वहां की बीमारियों का इलाज तो खोज लेते हैं, लेकिन रिम्स की ‘राजनीतिक नस’ को पकड़ने में हमेशा नाकाम साबित होते हैं.

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केली बंग्ला का भी विवादों से रहा है गहरा नाता
रिम्स का निदेशक बंगला, जिसे लोग प्यार से ‘केली बंगला’ कहते हैं, इस बंगले के असली मालिक यानी रिम्स के निदेशक अक्सर बेघर रहते हैं. साल 2020 की वह घटना कौन भूल सकता है, जब कोरोना का दौर था और जेल के कैदी वार्ड में बंद लालू प्रसाद यादव को ‘स्वास्थ्य सुरक्षा’ के नाम पर सीधे निदेशक के आलीशान बंगले में ‘शिफ्ट’ कर दिया गया था. उस समय रिम्स का निदेशक पद खाली था, लेकिन जब 16वें स्थायी निदेशक के रूप में डॉ. कामेश्वर प्रसाद ने कार्यभार संभाला, तो उन्हें एक बड़ा झटका लगा. एक स्थायी निदेशक होने के बावजूद, उन्हें अपने ही आधिकारिक आवास में घुसने की इजाजत नहीं थी, क्योंकि वहां पहले से ही वीआईपी अतिथि का कब्जा था.परिणाम यह हुआ कि दुनिया भर में नाम कमाने वाले डॉ. प्रसाद को अपना सरकारी बंगला छोड़कर मोरहाबादी के स्टेट गेस्ट हाउस में ‘शरणार्थी’ की तरह रहना पड़ा.
बाहरी हस्तक्षेप का ‘क्रॉनिक’ रोग
रिम्स छोड़ने वाले सीनियर डॉक्टरों की अगर जुबान खोली जाए, तो कहानी केवल बंगले तक सीमित नहीं हृ. वे बताते हैं कि रिम्स के संचालन में बाहरी हस्तक्षेप और अनावश्यक दबाव किसी असाध्य रोग की तरह है. यहां अस्पताल का निदेशक बनने का मतलब है,रोजाना उन फोन कॉल्स का जवाब देना जो मेडिकल साइंस से ज्यादा पॉलिटिकल साइंस से प्रेरित होते हैं. जब देश के शीर्ष संस्थानों से आए डॉक्टर यह देखते हैं कि उनकी फाइलें उनके हाथ से निकलकर किसी और की मेज पर जाकर अप्रूव या रिजेक्ट हो रही हैं, तो वे वही करते हैं जो आज तक हर निदेशक करता आया है इस्तीफा. वे अपनी डिग्री और वर्षों की मेहनत को रिम्स की गलियों में धूल फांकते देखने के बजाय, वापस अपने संस्थानों में लौटना ही बेहतर समझते हैं.
क्या रिम्स को मिलेगा अपना सुलतान
आज रिम्स के प्रशासनिक गलियारों में सन्नाटा है.एक और निदेशक जा चुका है.’केली बंगला’ फिर से खाली हुआ होगा या किसी और का इंतजार कर रहा होगा. सवाल यह नहीं है कि अगला निदेशक कौन होगा, सवाल यह है कि क्या आने वाला व्यक्ति उस कुर्सी की मर्यादा और बंगले की गरिमा को बचा पाएगा?रिम्स के हालात देखकर तो यही लगता है कि यहां निदेशक का पद एक ऐसा ‘कांटे का ताज’ है, जिसे पहनने से पहले ही सिर जख्मी हो जाता है. फिलहाल तो रिम्स के निदेशक पद का इतिहास यही कहता है,आइए, देखिए और इस्तीफा देकर सम्मान सहित लौट जाइए.


