सरायकेला: दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी के दैनिक मजदूर 35 साल से उपेक्षित, नियमितीकरण की लड़ाई हाईकोर्ट तक पहुंची

1986 से कार्यरत आदिवासी मजदूरों को नहीं मिला कुशल-अर्द्धकुशल का दर्जा, 935 रुपये से शुरू हुई थी मजदूरी Saraikela : 25 मई...

1986 से कार्यरत आदिवासी मजदूरों को नहीं मिला कुशल-अर्द्धकुशल का दर्जा, 935 रुपये से शुरू हुई थी मजदूरी

Saraikela : 25 मई 2026: दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी और गज परियोजना में पिछले 35-38 वर्षों से कार्यरत स्थानीय आदिवासी दैनिक वेतनभोगी मजदूर आज भी नियमितीकरण और कुशल-अर्द्धकुशल वेतनमान के लिए संघर्ष कर रहे हैं. विभाग पर आरोप है कि इतने वर्षों की सेवा के बाद भी एक भी मजदूर को कुशल, अर्द्धकुशल या अतिकुशल श्रेणी में नहीं रखा गया.

1986-1990 से कर रहे काम, तब 650 से 935 रुपये मिलता था वेतन

मजदूर नेताओं के अनुसार, 1986, 1988 और 1990 के दौर में दलमा क्षेत्र के स्थानीय आदिवासी युवाओं को दैनिक मजदूर के रूप में रखा गया था. उस समय प्रतिमाह 30 दिन काम करने पर 935 रुपये और कुछ को 650 रुपये तक वेतन मिलता था. उस दौर में पूरे दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में केवल 10-12 मजदूर, 8 फॉरेस्ट गार्ड और 2 वनरक्षी हुआ करते थे. तब टेरिटोरियल और वाइल्ड लाइफ विंग अलग-अलग थे. मजदूर जंगल में जीव-जंतुओं की देखरेख, गश्ती और ट्रैक रखरखाव का काम करते थे.

रॉयल बंगाल से लेकर गिद्ध तक थे दलमा में

पुराने मजदूर बताते हैं कि 80-90 के दशक में दलमा के जंगलों में रॉयल बंगाल टाइगर, चीता, वाइल्ड डॉग, भालू, हाथी, लकड़बग्घा, गिद्ध, चमगादड़, बाज समेत दर्जनों वन्यजीव आसानी से दिखते थे. मजदूर दिन-रात इनकी निगरानी और सुरक्षा में लगे रहते थे.

2013-2016 तक चला हाईकोर्ट में केस

नियमितीकरण की मांग को लेकर ‘दलमा दैनिक वेतनभोगी मजदूर संघ’ के बैनर तले मजदूरों ने 2013 में झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. 2013 से 2016 तक मामला चला। मजदूरों का दावा है कि उनके पक्ष में डिग्री भी हुई, लेकिन वन विभाग के अधिकारियों ने अब तक लागू नहीं किया.

अब भी ‘अनस्किल्ड’ की श्रेणी में

मजदूरों का आरोप है कि 35 साल जंगल की सेवा करने के बावजूद विभाग ने आज तक किसी को कुशल, अर्द्धकुशल या अतिकुशल श्रेणी में वर्गीकृत नहीं किया, सभी को ‘अनस्किल्ड’ मानकर न्यूनतम मजदूरी दी जा रही है। न पीएफ, न ग्रेच्युटी, न पेंशन की सुविधा है. कई मजदूर रिटायर हो चुके हैं, लेकिन खाली हाथ घर लौटे.                             

मजदूरों की मांग

  • 1986-1990 से कार्यरत सभी दैनिक मजदूरों को वन विभाग में नियमित किया जाए.
  •  काम की प्रकृति के अनुसार कुशल-अर्द्धकुशल का दर्जा देकर एरियर भुगतान हो.
  • हाईकोर्ट के आदेश को तुरंत लागू किया जाए. 

रिटायर मजदूरों को पेंशन-ग्रेच्युटी दी जाए

दलमा के दैनिक मजदूरों की लड़ाई जारी: हाईकोर्ट से डिग्री के बाद भी नियमितीकरण नहीं, 422 रुपये दिहाड़ी पर 30 दिन काम, वेतन 26 दिन का, 1986 से कार्यरत 12 में से 2 मजदूरों का निधन, 2 ने छोड़ा काम – अब 6 ही बचे, विभाग LPA कर टाल रहा मामला चांडिल अनुमंडल अंतर्गत दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी में दशकों से कार्यरत दैनिक वेतनभोगी मजदूरों का नियमितीकरण का संघर्ष अब भी जारी है. वन विभाग द्वारा नियुक्ति को “अवैध” बताने के बाद मजदूरों ने हाईकोर्ट से 2022-23 में फ्रेश डिग्री हासिल की, लेकिन विभाग अब तक जगह खाली नहीं होने का हवाला देकर मामले को टाल रहा है.

12 मजदूरों ने लड़ी कानूनी लड़ाई, 2 का निधन

जानकारी के अनुसार, नियमितीकरण के लिए 12 मजदूरों ने झारखंड हाईकोर्ट में हरसंभव कानूनी लड़ाई लड़ी, इस दौरान जगत सिंह और भीषण सिंह का निधन हो गया. वहीं तारणि सिंह और मो० शमीम अख्तर वेग ने आर्थिक तंगी के कारण काम छोड़ दिया. वर्तमान में केवल 6 मजदूर ही दलमा वन्य आश्रयणी में कार्यरत हैं.

                                      विभाग ने किया LPA, डिग्री के बाद भी टालमटोल

मजदूर संघ के अनुसार, हाईकोर्ट से डिग्री मिलने के बाद वन विभाग ने एलपीए (लेटर्स पेटेंट अपील) दाखिल कर दिया. 2022-23 में मजदूरों ने फिर से फ्रेश डिग्री हासिल की. आरोप है कि विभाग अब तक “पद रिक्त नहीं है” कहकर नियमितीकरण को टाल रहा है.

अब फिर जागे मजदूर, 50 दैनिक भोगी कार्यरत

वर्तमान में दलमा में लगभग 50 दैनिक वेतनभोगी मजदूर कार्यरत हैं. ये सभी माकुलाकोचा चेकनाका गेट पर पर्यटकों की देखरेख, पिंडराबेड़ा गेस्ट हाउस, माकुलाकोचा हाउस, मृग रेस्क्यू सेंटर, हिरण व दो हाथी रजनी और बादल की देखरेख, म्यूजियम, सेंचुरी में एलिफेंट ट्रैकर, जंगल सफारी व गाइड का काम कर रहे हैं.

30 दिन काम, वेतन 26 दिन का

मजदूरों का कहना है कि उन्हें प्रतिदिन 422 रुपये की दर से मजदूरी दी जाती है, लेकिन भुगतान केवल 26 दिनों का होता है. जबकि काम पूरे 30 दिन कराया जाता है. न साप्ताहिक अवकाश, न कोई अन्य सुविधा. पीएफ, ईएसआई, ग्रेच्युटी जैसी सामाजिक सुरक्षा से भी ये वंचित हैं.

मजदूरों का दर्द

एक मजदूर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “1988 से जंगल की सेवा कर रहे हैं. बाघ, हाथी, भालू से जान जोखिम में डालकर ड्यूटी की. अब बुढ़ापे में भी 26 दिन का वेतन मिलता है. साहब कहते हैं तुम्हारी नियुक्ति अवैध है. तो 35 साल तक काम क्यों कराया?”

आगे की रणनीति

दलमा दैनिक वेतनभोगी मजदूर संघ ने फिर से आंदोलन की चेतावनी दी है. संघ के प्रतिनिधि ने कहा कि जल्द ही श्रमायुक्त और वन मंत्री को ज्ञापन सौंपकर डिग्री लागू कराने की मांग की जाएगी. मांग पूरी न होने पर दलमा मुख्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया जाएगा. वन विभाग का पक्ष जानने के लिए डीएफओ दलमा से संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं मिल सका.

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