रांची: झारखंड के शैक्षणिक गलियारों में इस वक्त भारी आक्रोश और अनिश्चितता का माहौल है. राज्य के 223 इंटर कॉलेजों, उच्च विद्यालयों, संस्कृत स्कूलों और मदरसों के अनुदान में की गई अघोषित कटौती ने अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया है. आलम यह है कि अपनी ही सरकार के खिलाफ अब मंत्रियों और विधायकों ने भी अनुदान देने की मांग की है.
मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
शिक्षा के इस संकट को देखते हुए राज्य के एक दर्जन से मंत्री और विधायकों ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अनुदान बहाली की गुहार लगाई है. पत्र लिखने वालों में प्रमुख रूप से मंत्री संजय प्रसाद यादव, विधायक सुरेश पासवान और नागेंद्र महतो भी शामिल हैं. इन जनप्रतिनिधियों का कहना है कि बिना किसी ठोस कारण के अनुदान रोकना न केवल नियम विरुद्ध है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के भी खिलाफ है. ये संस्थान पिछले 25 से 30 वर्षों से राज्य के दूर-दराज इलाकों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं. यहां कार्यरत लगभग 7,000 से 8,000 शिक्षक और कर्मचारी नियमित वेतन के हकदार नहीं हैं; उनकी पूरी आजीविका साल में एक बार मिलने वाले इसी सरकारी अनुदान पर टिकी होती है.
हाशिए पर खड़े 4 लाख छात्र
इस कटौती की सबसे मारक चोट उन 4 लाख छात्र-छात्राओं पर पड़ रही है जो दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग से आते हैं. संस्थानों के पास संसाधन खत्म हो रहे हैं, जिससे इन गरीब बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूटने का खतरा पैदा हो गया है.
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