Giridih: जिले के गांडेय विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत जीतपुर पंचायत के दुर्गापहरी ग्राम का टोला डांडीघुटु इन दिनों भीषण जल संकट से जूझ रहा है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि यहां के करीब 40 घरों के लोग गंदे डाड़ी (तालाबनुमा स्रोत) का पानी पीने को मजबूर हैं.
गंदे पानी से स्वास्थ्य पर मंडरा रहा खतरा
विडंबना यह है कि यही पानी जानवर भी पीते हैं और इंसान भी, जिससे ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.
एकमात्र कुआं भी सूखा, नहीं कोई वैकल्पिक व्यवस्था
ग्रामीणों के अनुसार, पूरे टोले के लिए सरकार द्वारा सिर्फ एक कुआं उपलब्ध कराया गया था, जो अब पूरी तरह सूख चुका है. इसके अलावा कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने के कारण लोगों के पास डाड़ी का गंदा पानी ही एकमात्र सहारा बचा है.
जलापूर्ति योजना बनी ‘सफेद हाथी’
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वर्ष 2021-22 में एकल ग्राम जलपूर्ति योजना के तहत यहां एक पानी टंकी का निर्माण कराया गया था, लेकिन आज तक उस टंकी से एक बूंद भी पानी ग्रामीणों को नसीब नहीं हुआ. करोड़ों की योजनाएं कागजों तक सीमित रह गई हैं.
ग्रामीणों की शिकायत, नहीं मिला समाधान
ग्रामीण कुंती मुर्मू बताती हैं कि वर्षों से पानी की समस्या बनी हुई है, लेकिन आज तक कोई जनप्रतिनिधि हाल जानने तक नहीं पहुंचा. कई बार स्थानीय मुखिया को भी शिकायत की गई, मगर समस्या जस की तस बनी हुई है.
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पानी संकट से प्रभावित सामाजिक स्थिति
वहीं मुकेश हेंब्रम का कहना है कि पानी की गंभीर समस्या के कारण लोग यहां रिश्ता करने से भी कतराते हैं. गांव की स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है कि बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं.
बरसात में भी नहीं बदलते हालात
सुखु हेमब्रम बताते हैं कि गर्मी ही नहीं, बल्कि बरसात के दिनों में भी हालात नहीं बदलते. खेतों और गड्ढों में जमा पानी पीना उनकी मजबूरी बन चुका है.
समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन की चेतावनी
आक्रोशित ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो वे जिला प्रशासन के खिलाफ आंदोलन करने को बाध्य होंगे. ग्रामीणों ने स्थानीय विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन और मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू से भी गुहार लगाई है कि वे इस गंभीर समस्या पर तत्काल ध्यान दें.
प्रशासन और सरकार पर टिकी निगाहें
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या झारखंड सरकार और प्रशासन इन आदिवासी ग्रामीणों की पीड़ा को समझेगा, या फिर योजनाओं का दिखावा यूं ही चलता रहेगा? फिलहाल ग्रामीणों की निगाहें समाधान की उम्मीद में सरकार और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं.
