Ranchi: झारखंड में मानसून और उमस भरी गर्मी के साथ ही सर्पदंश (सांप काटने) की घटनाएं तेजी से बढ़ जाती हैं. हर साल ग्रामीण इलाकों, खेतों और जंगलों में रहने वाले सैकड़ों लोग इसका शिकार बनते हैं. हालात की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने सर्पदंश को ‘नोटिफाएबल डिजीज’ घोषित कर दिया है, ताकि हर मामले की अनिवार्य रिपोर्टिंग हो सके और बेहतर निगरानी के जरिए समय पर इलाज सुनिश्चित किया जा सके. लेकिन जमीनी हकीकत इस फैसले की प्रभावशीलता पर बड़े सवाल खड़े कर रही है.
डराने वाले आंकड़े
आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति पहले से ही भयावह रही है. साल 2025 में राज्य में सर्पदंश से 27 मौतें दर्ज की गईं. वहीं मई से जुलाई 2025 के बीच महज तीन महीनों में 1500 से ज्यादा लोग सांप के काटने का शिकार हुए, जिनमें 25 लोगों की जान चली गई. पलामू जिले में हालात और भी गंभीर रहे, जहां एक ही रात में चार लोगों की मौत हो गई, जिनमें दो मासूम बच्चे भी शामिल थे. महज 15 दिनों के भीतर छह मौतों ने पूरे इलाके को दहशत में डाल दिया. चैनपुर, उंटारी और गढ़वा जैसे क्षेत्रों में लगातार सैकड़ों मामले सामने आ रहे हैं.
इलाज की जमीनी हकीकत
सरकार ने सर्पदंश को नोटिफाएबल डिजीज घोषित कर भले ही एक बड़ा कदम उठाने का दावा किया हो, लेकिन सबसे बड़ी चिंता इलाज को लेकर है. हकीकत यह है कि झारखंड के करीब 90 प्रतिशत सरकारी अस्पतालों में एंटी-स्नेक वेनम (ASV) उपलब्ध नहीं है. ऐसे में जब कोई व्यक्ति सर्पदंश का शिकार होता है, तो उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से बड़े अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है. इस प्रक्रिया में लगने वाला समय ही कई बार मरीज की जान ले लेता है. यानी अस्पताल तक पहुंचने के बाद भी मरीज को तत्काल इलाज मिलना तय नहीं है.
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व्यवस्था पर उठते सवाल
राज्य में स्नेकबाइट प्रिवेंशन एंड कंट्रोल प्रोग्राम चलाए जाने और डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने के दावे भी जमीनी स्तर पर कमजोर नजर आते हैं. ग्रामीण इलाकों से लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि अस्पतालों में दवा की कमी है, प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है और कई जगहों पर आज भी लोग झाड़-फूंक और अंधविश्वास का सहारा लेने को मजबूर हैं. इलाज में देरी और सही चिकित्सा सुविधा की कमी ही मौतों का सबसे बड़ा कारण बन रही है.
मुआवजा बनाम हकीकत
सरकार की ओर से सर्पदंश से मौत होने पर चार लाख रुपये मुआवजा देने का प्रावधान है, लेकिन अब यह व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है. स्थिति ऐसी बनती दिख रही है कि लोगों को समय पर इलाज देने के बजाय मौत के बाद मुआवजा देने की व्यवस्था ज्यादा मजबूत है. इससे यह गंभीर सवाल उठता है कि क्या व्यवस्था लोगों की जान बचाने के बजाय केवल आंकड़ों और मुआवजे तक सीमित होकर रह गई है.
हर स्तर पर खतरा
सर्पदंश का खतरा सिर्फ आम ग्रामीणों तक सीमित नहीं है. अक्टूबर 2025 में पश्चिम सिंहभूम के सारंडा जंगल में एंटी-नक्सल ऑपरेशन के दौरान कोबरा बटालियन के एक जवान की मौत भी सांप काटने से हो गई थी. इससे यह साफ है कि यह समस्या हर स्तर पर गंभीर है और तत्काल ठोस कदमों की जरूरत है.
