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हजारीबाग में अमृत काल का क्रूर सच: तीन बच्चों के साथ जर्जर खपरैल में रहने को मजबूर दलित विधवा, क्या कागजों में ही सिमट कर रह गया ‘सबको आवास’ का सपना?

प्रशांत शर्मा Hazaribagh: एक तरफ जहां देश में ‘अमृत काल’ का जश्न मनाया जा रहा है और हर गरीब को पक्का मकान...

The brutal truth of the Amrit Kaal in Hazaribagh: A Dalit widow is forced to live in a dilapidated thatched house with three children. Has the dream of 'housing for all' remained confined to paper?

प्रशांत शर्मा

Hazaribagh: एक तरफ जहां देश में ‘अमृत काल’ का जश्न मनाया जा रहा है और हर गरीब को पक्का मकान देने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ प्रखंड से आई यह ग्राउंड रिपोर्ट सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच के खौफनाक फासले को बयां करती है. विष्णुगढ़ प्रखंड के अंतर्गत आने वाले गोविंदपुर पंचायत के मड़वाटांड़ गांव की रहने वाली मंगरी देवी की लाचारी और बेबसी व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है. तीन मासूम बच्चों के साथ जीवन बसर कर रही इस दलित विधवा महिला के सिर पर आज भी एक पक्की छत तक मयस्सर नहीं है.

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खपरैल की जर्जर छत और मिट्टी की दीवारें, इसी हालात में कट रही है जिंदगी

मड़वाटांड़ गांव पहुंचकर जब जमीनी हकीकत का जायजा लिया गया, तो विकास की तमाम बातें बेमानी साबित हो गईं. मंगरी देवी का पूरा परिवार एक बेहद ही जर्जर और खस्ताहाल खपरैल के मकान में रहने को मजबूर है. घर की दीवारें पूरी तरह से पक्की नहीं हैं और जगह-जगह से ढह रही मिट्टी की यह संरचना किसी भी वक्त किसी बड़े हादसे को आमंत्रण दे सकती है. घर के अंदरूनी हिस्से की स्थिति और भी बदतर है. ऊपर छत के नाम पर सिर्फ खपरैल है, जो बरसात के दिनों में पानी से सराबोर हो जाता है. घर के एक कोने में बना मिट्टी का चूल्हा और चंद बिखरे बर्तन इस बात की गवाही दे रहे हैं कि इस दौर में भी समाज का एक हिस्सा किस तरह विपरीत परिस्थितियों में जीने को विवश है.

बातचीत के दौरान रो पड़ी पीड़ित महिला, बयां की अपनी आपबीती

ग्रामीण क्षेत्र के जमीनी हालातों का जायजा लेने के दौरान जब पीड़ित महिला मंगरी देवी से उनके रहन-सहन और सरकारी योजनाओं के लाभ को लेकर बातचीत की गई, तो उनका दर्द आंसुओं के रूप में छलक पड़ा. उन्होंने रोते हुए बताया कि उनके पास कहने को तो राशन कार्ड उपलब्ध है, लेकिन सिर छुपाने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना या इंदिरा आवास का कोई लाभ आज तक उनके परिवार तक नहीं पहुंचा है. स्थानीय स्तर पर बिचौलियों और दलालों के तंत्र के कारण कई बार गरीब जनता के हक के पैसे बीच में ही दबा दिए जाते हैं, या फिर उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के लिए बेसहारा छोड़ दिया जाता है.

The brutal truth of the Amrit Kaal in Hazaribagh: A Dalit widow is forced to live in a dilapidated thatched house with three children. Has the dream of 'housing for all' remained confined to paper?

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जिओ-टैग और कागजी खानापूर्ति के नाम पर वसूली की आशंका

ग्रामीण इलाकों से अक्सर यह शिकायतें आती रही हैं कि आवास योजना के अप्रूवल और जिओ-टैग जैसी तकनीकी प्रक्रियाओं के नाम पर गरीब और अनपढ़ ग्रामीणों से अवैध रूप से पैसों की उगाही की जाती है. मंगरी देवी जैसी लाचार और असहाय महिलाएं, जो अपने बच्चों का पेट पालने के लिए रोजाना संघर्ष कर रही हैं. उनके पास ऐसे अनावश्यक खर्चों के लिए पैसे नहीं होते. नतीजतन, ऐसी जनकल्याणकारी योजनाएं रसूखदारों और बिचौलियों की साठगांठ की भेंट चढ़ जाती हैं और असली जरूरतमंद तिरपाल और जर्जर खपरैल के नीचे ही जीवन काटने को मजबूर रहता है.

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