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पारंपरिक स्वशासन में सरना आदिवासियों का संवैधानिक अधिकार दिलाने को लेकर आंदोलन जोरदार

Gumla:लगातार आदिवासी सरना समुदाय के लोगों के द्वारा ईसाई धर्म अपने के कारण उनकी परंपरागत जो अपनी पहचान थी वह मिट रही...

Gumla:लगातार आदिवासी सरना समुदाय के लोगों के द्वारा ईसाई धर्म अपने के कारण उनकी परंपरागत जो अपनी पहचान थी वह मिट रही है. जिसको लेकर इन दिनों पूरे राज्य में एक आंदोलन चल रहा है. इसी क्रम में रुधीजन ने जनजाति समन्वयक समिति के बैनर तले परंपरागत सामाजिक स्वशासन में आदिवासियों का संवैधानिक अधिकार सुरक्षित करने के लिए आंदोलन किया जा रहा है.

निशा उरांव के नेतृत्व में ज्ञापन सौंपा 

इस आंदोलन के संरक्षक निशा उरांव के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीण आज गुमला समाहरणालय पहुंचकर डीसी को ज्ञापन सौंप कर आदिवासियों के ग्रामीण स्वशासन व्यवस्था में अधिकारों को संरक्षित करने की मांग की है. इस मुद्दे को लेकर आंदोलन में शामिल लोगों से हमने खास बातचीत की जिसमें उन लोगों ने स्पष्ट कहा है कि जिस तरह से आदिवासी समुदाय के परंपरागत व्यवस्था पर ईसाई समुदाय के द्वारा हमला किया जा रहा है वह चिंता का विषय है. उन्होंने बताया कि ग्रामीण स्वशासन व्यवस्था में ईसाई समुदाय के साथ ही अन्य समुदाय के लोग कई महत्वपूर्ण पदों पर बैठ जा रहे हैं और अपने तरीके से व्यवस्था को चलाने का प्रयास कर रहे हैं. जिसके कारण पूरी व्यवस्था बर्बाद हो जा रही है.

आदिवासी समाज चिंतित 

इस मामले को लेकर लगातार आदिवासी समुदाय चिंतित है खास करके ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले सारण आदिवासी समुदाय के लोगों का मानना है कि जिस तरह से उनके धार्मिक व्यवस्था को बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले दिनों में आदिवासी समुदाय का अस्तित्व पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा. इन मुद्दों पर हमने निशा उरांव सहित अन्य लोगों से खास बातचीत की है जिसमें निशा उरांव ने कई महत्वपूर्ण बातों को रखने का काम किया है.आज गुमला जिला उपायुक्त महोदय को जिला के पारंपरिक आदिवासी अगुआ द्वारा ज्ञापन सौंपा जाएगा.

इस ज्ञापन में निम्नलिखित मुख्य मांग हैं

1. आदिवासी समाज के पारंपरिक व्यवस्था ( जैसे पड़हा , डोकलो सोहर , इत्यादि ) के पदों पर धर्मांतरित आदिवासी नहीं बना रह सकता है. हर पद की धार्मिक और सामाजिक दोनों जिम्मेदारी होती है. धर्मांतरित आदिवासी सामाजिक जिम्मेदारी तो निभा लेता है, लेकिन धार्मिक जिम्मेदारी नहीं निभा पाता है. इससे आदिवासी मूल आस्था और संस्कृति को गहरा नुकसान हो रहा है. इस विषय ओर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय समाज के पक्ष में है.

2 . एक और सुप्रीम कोर्ट निर्णय के अनुसार, बिना ग्राम सभा के अनुमति के चांगई सभा नहीं किया जा सकता है.

3. नई पेसा नियमावली के द्वारा, ग्राम सभा पर गैर पारंपरिक पद थोपे जा रहे हैं जैसे कोषाध्यक्ष ,अध्यक्ष ,सचिव, इत्यादि. अतः यह मांग की जा रही है की पांचवीं अनुसूची के ग्राम सभा के पद, पारंपरिक नियमों के अनुसार हो.

इस “पारंपरिक उलगुलान” की शुरुआत खूंटी जिले में की जा चुकी है. इस उलगुलान में मुंडा , खड़िया , उरांव तथा संथाल समाज के पारंपरिक अगुआ जुड़े हैं. इसकी अगुवाई “रूढ़िजन्य जनजाति समन्वय समिति” द्वारा की जा रही है. इस समिति की संरक्षक निशा उरांव IRS हैं , अध्यक्ष महादेव मुंडा है , सदस्य सचिव पूर्णा मुंडा है.

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