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झारखंड में 12 साल बाद फिर ताजा हुआ फर्जी नक्सल सरेंडर का मामला, इस बार ओडिशा पुलिस पर उठ रहे सवाल

SAURAV SINGH रांची: झारखंड में 12 साल पहले हुए बहुचर्चित 514 युवकों के फर्जी सरेंडर मामले की यादें अभी भी अदालत के...

SAURAV SINGH

रांची: झारखंड में 12 साल पहले हुए बहुचर्चित 514 युवकों के फर्जी सरेंडर मामले की यादें अभी भी अदालत के गलियारों में न्याय का इंतज़ार कर रही हैं, इसी बीच एक ताज़ा घटनाक्रम ने पुलिसिया कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है. पश्चिमी सिंहभूम की एक आदिवासी महिला, मोण्गडी होनहागा, को ओडिशा पुलिस द्वारा नक्सली बताकर सरेंडर कराए जाने पर झारखंड से लेकर ओडिशा तक विवाद खड़ा हो गया है.

क्या है ताजा मामला?

ओडिशा के राउरकेला में पश्चिमी रेंज के डीआईजी बृजेश कुमार राय और एसपी नितेश वाधवानी के सामने छोटानागरा निवासी मोण्गडी होनहागा ने आत्मसमर्पण किया. पुलिस ने दावा किया कि वह नक्सली संगठन की सक्रिय सदस्य थी और कई बड़े कांडों में शामिल थी. महिला के परिजनों ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि, मोण्गडी एक साधारण ग्रामीण है, उसका किसी संगठन से कोई लेना-देना नहीं है. झारखंड पुलिस के किसी भी आपराधिक रिकॉर्ड में उसका नाम दर्ज नहीं है. परिजनों का आरोप है कि उसे साजिश के तहत फंसाया गया है.

12 साल पुराना वो मामला,जब 514 युवाओं के भविष्य से हुआ खिलवाड़:

वर्तमान घटना ने 2014 के उस काले अध्याय की याद दिला दी है, जिसमें 514 निर्दोष युवाओं को नक्सली बताकर सरेंडर करवा दिया गया था, उस मामले के मुख्य बिंदु आज भी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाते हैं. पूर्व सैनिक रवि बोदरा और दिनेश प्रजापति ने मिलकर इस पूरे खेल को रचा था. उन्होंने युवाओं को सेना और सीआरपीएफ में नौकरी दिलाने का लालच दिया. शर्त यह रखी गई कि नौकरी तभी मिलेगी जब तुम नक्सली के रूप में सरेंडर करोगे.नौकरी के लालच में गरीब आदिवासियों ने अपनी ज़मीन और मोटरसाइकिलें बेचकर बिचौलियों को पैसे दिए. उन्हें लगा कि यह सरेंडर उनके सुनहरे भविष्य का रास्ता है.।हैरानी की बात यह थी कि इन 514 युवाओं को रांची की पुरानी जेल में सीआरपीएफ की निगरानी में रखा गया, लेकिन कभी किसी अदालत में पेश नहीं किया गया. मानवाधिकार आयोग ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी. पुलिस की जांच में यह स्वीकार किया गया कि रवि बोदरा और दिनेश प्रजापति के बड़े पुलिस अफसरों के साथ संबंधों की गहराई से जांच नहीं की गई. फाइलें बंद कर दी गईं, लेकिन मामला आज भी हाईकोर्ट में लंबित है.

ओडिशा और झारखंड के इस कनेक्शन’ ने कई अनसुलझे सवाल पैदा कर दिए हैं:

• क्या ओडिशा पुलिस ने सरेंडर से पहले महिला की पृष्ठभूमि की जांच झारखंड पुलिस से की थी?

• क्या पुलिस पदक और वाहवाही के चक्कर में निर्दोषों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है?

• यदि झारखंड में कोई रिकॉर्ड नहीं है, तो एक ग्रामीण महिला अचानक ओडिशा में नक्सली कैसे बन गई?

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